Repent and Believe | मन फिराओ और विश्वास करो | Luke 19:1-10

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Repent and Believe | मन फिराओ और विश्वास करो | Luke 19:1-10 पिछले विषय में हमने बाइबल अध्ययन करने का एक तरीके के बारे में बात किया था। जिसे हम तलवार विधि (Sword Method) के नाम से जानते हैं।

आज हम उसी विधि का उपयोग कर कुछ अभ्यास करेंगे। आइए लूका रचित सुसमाचार 19:1-10 तक पढ़ें। ध्यान रहे, यदि आप सच में बाइबल अध्ययन के प्रति गंभीर हैं तो साथ साथ में इन आयतों को बाइबल में भी पढ़ें।

जैसा कि लूका 19 में हमें मालूम होता है कि यीशु यरीहो से प्रवेश करके जा रहा था। यरीहो में जक्कई नामक एक मनुष्य था जो कि बहुत धनवान व्यक्ति था और वह चुंगी लेने वालों का मुखिया था।

जक्कई प्रभु यीशु को देखने के लिए काफी उत्सुक था। शायद उसने उस अंधे भिखारी के बारे में सुना होगा जिसे प्रभु यीशु ने उस वक्त चंगा किया था जब यीशु यरीहो के निकट पहुंचे थे। (लूका 18:35-43) शायद इसी वजह से जक्कई की प्रभु यीशु को देखने की उत्सुकता काफी बढ़ गई। लेकिन विडम्बना यह थी कि प्रभु यीशु हर समय भीड़ से गिरे रहते थे और इधर जक्कई एक छोटे कद काठी का व्यक्ति था।

लेकिन वो काफी चतुर व्यक्ति भी था। इसलिए वह दौड़कर एक पेड़ पर चढ़ गया ताकि वो प्रभु यीशु को देख सके कि वो कैसा व्यक्ति है क्योंकि उसे मालूम हो गया था कि यीशु उसी मार्ग से जाने वाले थे।

जब प्रभु यीशु उस जगह पहुंचे तो उन्होंने ऊपर दृष्टि करके कहा, “हे जक्कई जल्दी से उतर आ। क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना जरूरी है।” शायद जक्कई काफी हैरान हुआ होगा कि जिस व्यक्ति को वो सिर्फ देखना चाहता है, वो उसका नाम भी जानता है और उसके घर भी जाना चाहता है।

फिर क्या था? जक्कई को तो उम्मीद से भी ज्यादा मिला। वो बड़े आंनद से पेड़ से उतरा और यीशु को अपने घर ले गया।

हालांकि ये बात काफी लोगों को पसंद नहीं आयी। क्योंकि वे सोचते थे कि जक्कई एक पापी व्यक्ति है और यीशु एक धार्मिक व्यक्ति, इसलिए यीशु को उसके घर नहीं जाना चाहिए। जैसा कि हमने शुरू में देख लिया था कि जक्कई चुंगी लेने वालों का मुखिया था। इसलिए उसके लिए लोगों को ठगना ज्यादा आसान था। वह लोगों से अन्याय करके ज्यादा चुंगी भी वसूलता था।

जक्कई के इसी कार्य कि वजह से जक्कई को बहुत पापी व्यक्ति समझा जाता था, और लोग उससे काफी घृणा करते थे।

इसलिए जब प्रभु यीशु उसके साथ उसके घर जा रहे थे तो लोग कुड़कुड़ाकर कहने लगे कि यीशु तो एक पापी व्यक्ति के यहां जा उतरा है। लोग मन ही मन जक्कई और प्रभु यीशु का न्याय भी करने लग गए थे। जबकि उन्होंने प्रभु को नहीं पहचाना था कि वो किसी का पक्षपात नहीं करता है। और वे यह भी भूल गए थे कि कुड़कुड़ाना भी एक पाप है।

उधर जब यीशु जक्कई के घर पहुंचे तो जक्कई ने यीशु के सामने और पूरी जनता के सामने अपने गुनाहों को स्वीकार कर दिया। जक्कई ने यीशु से कहा कि प्रभु आज मैं अपनी आधी संपत्ति कंगालों को देता हूं और यदि किसी का अन्याय करके किसी का कुछ भी ले लिया है उसे चार गुना वापिस लौटा देता हूं।

इतना परिवर्तन? वो भी पहली ही मुलाकात में? शायद भीड़ से पहले जक्कई ने यीशु के प्रभुत्व को पहचान लिया था, तभी उसने अपनी गलतियों को स्वीकार कर दिया। उसने अपने मन को पापों से फेर लिया और उसने यीशु के ऊपर विश्वास कर दिया था कि यीशु ही प्रभु है।

सच में सच्चा पश्चाताप सिर्फ बोलने से ही नहीं होता है पर उसको व्यवहारिकता में लाना ही सच्चा पश्चाताप होता है।

जक्कई के इस खुलेआम पश्चाताप के बाद यीशु ने कहा कि आज इस घर में उद्धार आया है। उद्धार यानि मोक्ष, मुक्ति सिर्फ यीशु में विश्वास करने से और अपने पापों को उसके समक्ष स्वीकार करने से मिलता है।

उसके बाद यीशु ने एक और बात कही कि “यह भी अब्राहम का पुत्र है।” जक्कई को अब्राहम का पुत्र इसलिए कहा गया क्योंकि जब परमेश्वर ने अब्राहम को बुलाया था तो अब्राहम ने भी परमेश्वर पर विश्वास किया था।

यीशु यहां धरती पर अपने आने के कारण को भी स्पष्ट करते हैं कि वह इसलिए इस दुनियां में आए ताकि जो खो गए हैं उनको ढूंढे और उनका उद्धार करे। यहां खोए हुए लोगों से तात्पर्य यह है कि जो लोग जक्कई की तरह धन को ही अपना ईश्वर समझते हैं और इस दुनियां में अपने उद्देश्य को भूल गए हैं और धन को अन्याय करके भी कमाते हैं किसी दूसरे का नुकसान करके अपना लाभ कमाते हैं। वो लोग खो गए हैं।

चलिए अब हम तलवार विधि से इस का अध्धयन करें। हालांकि मैंने पहले से ही कुछ भागों का व्याख्यान कर दिया है पर आप किसी भी भाग को पढ़ने के बाद आप तलवार विधि इस्तेमाल कर सकते हैं।

इस कहानी में हम परमेश्वर के बारे में क्या सीखते हैं?

परमेश्वर हर एक व्यक्ति का नाम जानता है। वो सर्वज्ञानी हैं। जैसा कि हम इस लेखांश में देखते हैं कि यीशु जक्कई का नाम जानते हैं जबकि वो पहले कभी मिले भी नहीं। परमेश्वर मनुष्य के साथ संगति करता है, वह हमारे घर में रहना चाहता है। परमेश्वर किसी के साथ भेदभाव नहीं करता है।

वह सब से प्रेम करता है। उसका नजरिया मनुष्य के नजरिये से भिन्न है। वही उद्धारकर्ता है। परमेश्वर खोए हुए लोगों से प्रेम करता है। जिसके जीवन या घर में उसकी उपस्थिति होती है उसका जीवन बदल जाता है। वो हर एक व्यक्तित्व को उद्धार देने आया है।

इस कहानी में हम मनुष्य के बारे में क्या सीखते हैं?

मनुष्य में सच्चाई को जानने की उत्सुकता होती है। मनुष्य अतिथि सत्कार करने वाला भी है। और मनुष्य बिना अपनी गलतियों को देखकर दूसरों पर दोष लगाने वाला भी है, दूसरों का न्याय करने वाला भी है। मनुष्य कुड़कुड़ाने वाला भी है।

यदि मनुष्य की संगति परमेश्वर के साथ हो जाए तो उसे अपनी गलतियों को स्वीकार करने में और उनको छोड़ने में कोई भी नहीं रोक सकता। जब मनुष्य के जीवन या घर में परमेश्वर आते हैं तो मनुष्य का पूरा जीवन बदल जाता है।

हम आनंद को अपने जीवन में महसूस कर सकते हैं। हमारा प्रभु यीशु पर विश्वास करना कुछ लोगों को रास नहीं आता है। मनुष्य खोया हुआ है। मनुष्य प्रभु यीशु पर विश्वास करके और मन फिराकर उद्धार प्राप्त कर सकता है।

क्या इस कहानी में किसी पाप का जिक्र है जिसे हमें छोड़ने की आवश्यकता है?

कुड़कुड़ाना पाप है, दूसरों पर दोष लगाना पाप है, बिना सच्चाई को जाने दूसरे का न्याय करना भी पाप है। किसी का अन्याय करके लूटना या ठगना भी पाप है। यदि मनुष्य इस दुनियां में खो जाता है अर्थात अपने जीवन के लक्ष्य को भूल जाता है तो यह भी पाप है।

क्या इस कहानी में कोई आज्ञा या उदाहरण है जिसे हमें अपने जीवन में लागू करना चाहिए?

इस कहानी में हम जक्कई के उदाहरण से सीख सकते हैं कि जैसे उसका जीवन यीशु के साथ संगति में बदल गया, उसी प्रकार हमारा भी जीवन उसकी संगति से बदल जाता है। हम जक्कई के जीवन से सीख सकते हैं कि यदि हमने भी किसी से अन्याय करके लूटा है तो हम उसे वापस फेर दें।

यदि हमें भी हमारे पाप ज्ञात हों तो हम उन्हें प्रभु के समक्ष स्वीकार कर लें। ताकि प्रभु के साथ हमारा संबंध और घनिष्ठता में बढ़ता जाए। इस कहानी में अदृश्य रूप से आज्ञा यह है कि हम पश्चाताप करें और प्रभु यीशु के ऊपर विश्वास करें।

आप इस तरह से भी लिख सकते हैं…

परमेश्वर?मनुष्य?पाप?आज्ञा या उदाहरण?
Sword Bible Study Method

पश्चाताप और विश्वास

पश्चाताप का क्या मतलब होता है? – पाप से मुंह फेर लेना और प्रभु यीशु का अनुयायी बन जाना।

विश्वास करने का क्या मतलब होता है? – यीशु को प्रभु मानकर उस पर भरोसा करना।

हमें पश्चाताप करने की जरुरत क्यों है? – क्योंकि सबने पाप किया है और परमेश्वर से रहित है, पाप की मजदूरी मृत्यु है। और यदि हम अपने पापों को मान लेते हैं और यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार कर लेते हैं तो उद्धार निश्चित है। (रोमियों 3:23, 6:23, 10:9-10)

पश्चाताप किसे करना है? – सभी को पश्चाताप करने की आवश्यकता है। (प्रेरितों 2:38-41) क्योंकि सभी पापी हैं और परमेश्वर से दूर हैं।

क्या उद्धार निश्चित है? – जब हम अपने पापों को मान लेते हैं तो प्रभु हमें माफ़ कर देता है और हमें शुद्ध कर देता है। (1 यूहन्ना 1:9) हमारी मुक्ति प्रभु यीशु से ही आई है। (यूहन्ना 10:28)

कुछ जरुरी बातें…

ध्यान रहे, यह जल्दी से शिष्य बनाने का एक तरीका है ताकि हर एक विश्वासी बाइबल को समझ सके। जब आप इस विधि को ग्रुप में सिखाते हैं तो लोगों को उत्तर ढूंढने दें ताकि वो भी इस विधि को अपने अध्ययन में लागू कर दें। इस तरीके से आप किसी लेखांश अथवा भाग को लगभग 6 बार दोहराएंगे। जिससे कि कोई भी भाग या कहानी आसानी से याद हो जाएगी।

और आसानी से बहुत से चीजों को ढूंढ कर निकालेंगे और अपने जीवन में लागू कर पाएंगे। इस बात का भी ध्यान रखें कि आप जिस लेखांश को पढ़ रहे हैं उसी में से उत्तर को ढूंढने की कोशिश करें।

हम बहुत बार इस तरह के बाइबल अध्ययन में “लेखांश” की जगह “कहानी” शब्द का इस्तेमाल करते हैं, ताकि विश्वासी लोग आसानी से समझे, पर इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि हम कोई मनगढ़ंत कहानी की बात कर रहे हैं। ये इतिहास की सच्ची घटनाएं हैं जिन्हें हम परमेश्वर के जीवित वचन में पढ़ते हैं।

शालोम

Anand Vishwas
Anand Vishwas
आशा है कि यहां पर उपलब्ध संसाधन आपकी आत्मिक उन्नति के लिए सहायक उपकरण सिद्ध होंगे। आइए साथ में उस दौड़ को पूरा करें, जिसके लिए प्रभु ने हम सबको बुलाया है। प्रभु का आनंद हमारी ताकत है।

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