The Christian and Government | एक मसीही कब तक सरकार के नियमों को मानने के लिए बाध्य है?

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The Christian and Government | एक मसीही कब तक सरकार के नियमों को मानने के लिए बाध्य है? क्या आप आज के समय में हमारे देश और दुनियां की दशा और दिशा के बारे में मूल्यांकन कर सकते हैं? क्या सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है? क्या देश के अगुवे या अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों के प्रति ईमानदार हैं?

जॉन सी मैक्सवेल कहते हैं कि “हर एक उन्नति और पतन, नेतृत्व पर निर्भर है।” कितनी सटीक बात है न? अच्छी अगुवाई उत्त्थान की ओर ले जाती है और गलत अगुवाई पतन की ओर। आप इतिहास में देख सकते हैं… जब-जब किसी देश ने तरक्की की है तो उनमें भले अगुवे के कारण और उनके मार्गदर्शन से ही ये संभव हो पाया है… हिटलर और मुसौलिनी को तो आप जानते ही होंगे कि उनके नेतृत्व में देश-दुनियां पर क्या असर पड़ा। आप आज कि साम्यवादी सरकारों और शासकों को भी जानते ही हैं तो एक मसीही व्यक्ति को यह सोचना होगा कि क्या कैसर की आज्ञा का पालन हर समय जरुरी है? (मती 22:21)

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परमेश्वर का वचन बताता है कि हमें भले कामों को करने के लिए सृजा गया है। (इफिसियों 2:10) आज हम बात करेंगे कि परमेश्वर हमसे क्या चाहता है जब हम किसी देश के निवासी हैं। क्या परमेश्वर के लोगों को सरकार के अधीन रहना चाहिए? क्या करें जब सरकार ही भ्रष्ट हों? ऐसी परिस्थिति में मसीहियों की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए और उनका जीवन कैसा होना चाहिए? 

क्या परमेश्वर के वचन में मसीहियों के लिए सरकार के प्रति जिम्मेदारियों के प्रति निर्देश हैं? इसका जवाब हैं; हाँ, जरूर! परमेश्वर का पवित्र वचन हमें इसके बारे में भी स्पष्ट करता है। मसीहियों को सरकार के अधिकारियों के अधीन क्यों रहना है? मसीहियों को सरकार के अधीन परमेश्वर को सम्मान देने के लिए रहना जरुरी है क्योंकि परमेश्वर ने ही सरकार को शासन करने का अधिकार दिया है।

परमेश्वर का अनुग्रह, परमेश्वर का प्रेम, परमेश्वर की दी हुई आत्मिक आशिषें और परमेश्वर की दया हमें प्रेरित करती हैं कि हम अपने आप को जीवित, पवित्र, परमेश्वर को भावता हुआ समर्पित कर दें। यही एक मसीही व्यक्ति की आराधना और आत्मिक सेवा है। परमेश्वर का वचन हमें निर्देश देता है कि हम इस दुनियां के जैसे न बनें। बल्कि हमारे मन के बदलने से हमारा चालचलन भी बदलना चाहिए। (रोमियों 12:1-2)

मसीहियों के जीवन से मसीह दिखना चाहिए। (फिलिप्पियों 2:5) रोमियों 13 अध्याय का यह भाग उन लोगों के प्रति हमारे व्यवहार पर केंद्रित हैं जो हम पर शासन करते हैं। यह अध्याय दुनियां के प्रलोभन में दोबारा न पड़ने की चेतावनी देते हुए खत्म होता है। (रोमियों 13:14) आइए बाइबल में रोमियों 13:1-7 को पढ़ें। 

पौलुस मसीहियों को सरकार के प्रति कर्तव्य के बारे में क्यों लिख रहा है?

रोमियों 1-8 अध्यायों में पौलुस सुसमाचार को समझाता है कि सुसमाचार क्या है और मनुष्य को सुसमाचार की जरूरत क्यों है? वहां से आगे के अध्यायों में सुमाचार को लागू किया गया है, सुसमाचार का प्रभाव एक मसीही के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करता है। तो यह निश्चित है कि किसी देश के नागरिक होने के नाते मसीही का रवैया या उसका व्यव्हार कैसा होना चाहिए?

परमेश्वर का वचन स्पष्ट करता है कि हर एक व्यक्ति शासन करने वाली ताकतों के अधीन होने के लिए जिम्मेदार है। (रोमियों 13:1) यहां पर गौर करें; हर व्यक्ति लिखा गया है जो कि व्यक्तिगत कर्तव्य की ओर संकेत करता है। पौलुस यहां मसीहियों को संबोधित करता है कि किसी भी व्यक्ति को इस कर्तव्य से छूट नहीं मिली है। किसी के पास भी ऐसा कोई खास अधिकार नहीं है जिसके कारण वह शासकीय अधिकारियों द्वारा बनाए गए कानूनों को वह तोड़ सके या नजरंदाज कर सके। 

रोमियों 13:1-2 बताता है कि मसीहियों को अधिकारियों के अधीन क्यों रहना चाहिए? इसका जवाब है कि परमेश्वर को सम्मान देने के लिए, जिसने सरकार को शासन करने का अधिकार दिया है। पौलुस कहता है कि अधिकारी जन परमेश्वर के आदेश के कारण अस्तित्व में हैं। इसका अर्थ यह बिल्कुल भी नहीं है कि अधिकारी सब कुछ परमेश्वर की इच्छा के अनुसार करते हैं। इनमें कई अच्छे और कई बुरे अधिकारी भी हैं।

कुछ अधिकारी परमेश्वर द्वारा दी गई ताकत का इस्तेमाल परमेश्वर की इच्छा के अनुसार करते हैं और कुछ अधिकारी ऐसे भी हैं जो अपनी ताकत का दुरुपयोग करते हैं। प्रेरित पौलुस यहां अधिकारियों की ताकत के इस्तेमाल के बारे में नहीं कह रहा है बल्कि उसके कहने का मतलब है कि उनकी शुरुआत किसने की? और उनको अधिकारी किसने बनाया है? उनको परमेश्वर द्वारा स्थापित किया गया है इसलिए उनका अस्तित्व, उनका हक़ और उनकी ताकत परमेश्वर की ओर से है। 

आप अपने आस-पास इस अधिकार और इसकी व्यवस्था का परिणाम भी देख सकते हैं। उनकी सुव्यवस्था का लाभ हर व्यक्ति लेता है। इस सुव्यवस्था में स्कूल, कॉलेज, प्रशासनिक अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी, सड़क, बिजली, पानी, यातायात नियम, देश की सुरक्षा व्यवस्था, न्याय व्यवस्था इत्यादि की व्यवस्था आप अपने आस-पास देख सकते हैं और उनके लाभों से भी आप परिचित हैं।

वचन हमें बताता है कि परमेश्वर ने इंसानी सरकारों को व्यवस्था बनाए रखने और जो लोग उस व्यवस्था को भंग करते हैं उन्हें सजा देने की जिम्मेदारी दी है। (रोमियों 13:1-2) पौलुस यहाँ ऐसी सरकार का विवरण दे रहा है जो गलत करने वालों के लिए डर का कारण है और सही जीवन और न्याय को प्रोत्साहित करती है। मसीहियों को निश्चित तौर पर अपनी सरकार के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए और उनके लिए प्रार्थना भी करनी चाहिए ताकि वे इस पद पर बुद्धिमानीपूर्वक फैसले ले सकें और सुव्यवस्था बनी रहे। क्या आप उनके लिए प्रार्थना करने की जिम्मेदारी को महसूस करते हैं? मेरा सुझाव है कि आप अपनी दैनिक प्रार्थना में अपने अधिकारियों के लिए प्रार्थना जरूर करें।

पौलुस उन ऊंचे अधिकारियों को “परमेश्वर का सेवक” कहता है। (रोमियों 13:4-6) पौलुस मसीही लोगों को कारण देता है कि हमें कानून मानने की आवश्यकता क्यों है? यहां पर दो कारण बताए गए हैं। पहला इसलिए कि हमें हमारे ऊपर के अधिकारियों से कानून तोड़ने की सजा से बचने के लिए हमें आदेश मानने की जरूरत है और दूसरा कारण यह है कि हम परमेश्वर की आज्ञा को तोड़ने वाले नहीं बनना चाहते हैं क्योंकि हमारा विवेक भी बताता है कि हमें अपने अधिकारियों के अधीन रहना है। 

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परंतु अगर अधिकारी अच्छे लोगों के लिए डर का कारण हैं तो क्या? हालांकि पौलुस यहां बुरे शासकों या सरकारों के बारे में बात नहीं कर रहा है। फिर भी इस सवाल का उत्तर ये होना चाहिए “जो कैसर का है वो कैसर को दो और जो परमेश्वर का है उसे परमेश्वर को दो।” (मती 22:21) हालांकि यह सिद्धांत कर का भुगतान करने लिए किया गया था पर यह सिद्धांत तो हमें उसकी सीमा से भी बाहर ले जाता है। 

रोमियों 13:7 हमें सिखाता है कि हमें हर किसी को बकाया देना है, फिर चाहे वो कर हो, राज्य की आय हो, हक़ हो या फिर सम्मान हो। ध्यान दें कि सम्मान और आदर उस पदवी पर निर्भर हैं जो एक व्यक्ति सरकार में “परमेश्वर के सेवक” के रूप में पाता है। हर एक व्यक्ति को उस अधिकारी की पदवी के कारण सम्मान देना है, भले ही उसके काम वैसे न हों जैसे उन्हें होना चाहिए। तो अब ये भी सवाल उठता है कि एक मसीही व्यक्ति को कब तक सरकार का हुक्म मानना चाहिए? 

एक मसीही व्यक्ति कब तक सरकारी आदेशों को मानने के लिए बाध्य है?

आज की विपरीत परिस्थिति में भी कई लोगों के मन में ये सवाल हो सकता है। क्या मसीहियों को इस आदेश का पालन करना चाहिए कि उन्हें अपने शासक की या फिर अधिकारियों की पूजा करनी चाहिए? या फिर परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए जिसके कि वो योग्य है और बाइबल भी हमें आदेश देती है? मसीही लोगों के लिए क्या सीमाएं हैं? इसके बारे में बाइबल स्पष्ट है। इस संघर्ष में किसको प्राथमिकता मिलनी चाहिए? इंसानी अधिकारी को या परमेश्वर को? 

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जब पतरस और दूसरे प्रेरितों ने इस सवाल का सामना किया तो उन्होंने कहा कि “मनुष्यों  की आज्ञा के बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही हमारा कर्तव्य है।” (प्रेरितों 5:29) प्रेरितों के फैसले और उसके हिला देने वाले परिणाम के वर्णन को आप प्रेरितों 4:1-31 और प्रेरितों 5:12-42 में पढ़ सकते हैं। मुझे लगता है कि आज फिर से मसीहियों को प्रेरितों के काम की पुस्तक को पढ़ना चाहिए क्योंकि आज भी यह पुस्तक ख़त्म नहीं हुई है। जब इंसान की आज्ञा और परमेश्वर की आज्ञा के बीच में संघर्ष होता है तब हमें पतरस और प्रेरितों से सीखना चाहिए कि उचित रवैया क्या है। परमेश्वर का आज्ञापालन मनुष्यों का सर्वोत्तम कर्तव्य है। 

हमें विशेष ध्यान देना चाहिए कि रोमियों 13:1-7 में मौजूदा अधिकारियों के लिए आज्ञाकारिता और सम्मान पर ज्यादा ज़ोर दिया गया है। ऐसी परिस्थितियां भी पैदा हो सकती हैं जहां पर मसीही के लिए यह जान पाना मुश्किल हो सकता है कि वह क्या करे। जब इंसानों के आदेश गंभीरता से परमेश्वर के खिलाफ लगते हैं तो हमें निश्चित तौर में पवित्रात्मा की तरफ उसके ज्ञान और मार्गदर्शन के लिए देखना चाहिए। और साथ ही साथ ऐसे लोगों के लिए भी प्रार्थना करनी चाहिए जो इस वक्त ऐसी परिस्थिति में हैं ताकि वो व्यक्ति अपने जीवन में परमेश्वर के आदेश को प्राथमिकता दे सकें।

परमेश्वर ही है जो राजाओं का उदय और अस्त करने वाला है। परमेश्वर ही है जो मनुष्यों के राज में भी शासन करता है। आप इसके उदाहरण को सम्पूर्ण बाइबल में देख सकते हैं। दानिय्येल और उसके तीन विश्वासयोग्य साथियों के जीवन से हमें प्रेरणा मिलती है कि हम किस प्रकार विश्वासयोग्यता के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभा सकते हैं और हम ये भी सीख सकते हैं कि मनुष्य को आज्ञा से बढ़कर, परमेश्वर का आज्ञापालन करना एक ईश्वरीय व्यक्ति का गुण है। (दानिय्येल 2:20-22, 37,38, 4:37, 3:16-18, 6:26-27 कृपया पढ़ें) फिर चाहे वे गुलामी में हों, फिर चाहे संघर्ष क्या खाना, क्या पीने में हो, फिर चाहे संघर्ष किसको दंडवत करना या ना करने में हो। एक मसीही व्यक्ति को ये मालूम होना चाहिए। बाइबल हमें स्पष्ट रूप से बताती है कि हमें अपने देश और लोगों के प्रति वफादार बने रहना है। हम चाहे कहीं भी हों, हमारे अच्छे कार्यों की लोग प्रसंसा करे या ना करे पर मेरे प्रिय, हमारे जीवन से प्रभु को महिमा हर समय मिलने पाए। यही उद्देश्य चलित जीवन है जिसकी मांग हर एक मसीही जन से है।

आज कई मसीही भी सरकारी अधिकारियों के पद पर आसीन हैं। आपको जहां भी परमेश्वर ने नियुक्त किया है उस पदवी पर आपको विश्वासयोग्यता से अपनी जिम्मेदारियों को निभाना है। किसी ने इस प्रकार कहा है, “आपका कार्यक्षेत्र ही कार्यभूमि है।” जहाँ आपको परमेश्वर के विश्वासयोग्य गवाह बनना है। आपको घूस नहीं लेना है, आपके जीवन में “मसीह” हर जगह, हर समय दिखाई देना चाहिए। आप जगत की ज्योति हैं, आप पृथ्वी के नमक हैं। आपको अपने जीवन को ऐसे जीना है कि लोग आपके भले कार्यों को देखकर परमेश्वर की महिमा कर पाएं। साथ ही साथ दूसरे लोगों का मार्गदर्शन करना भी आपकी जिम्मेदारी है।

इस लेख को पढ़ने वाले कई मसीही लोग विभिन्न पदों पर आसीन होंगे। आप उस पदवी पर कैसे परमेश्वर के सेवक के रूप में अपने कार्यों को कर सकते हैं? आप परमेश्वर की सेवा और देश की सेवा और बेहतर तरीके से कैसे कर सकते हैं? कृपया थोड़ा विचार अवश्य करें।

आज भी जब आप पर झूठे आरोप लगाए जाएं तो मसीह के विश्वासयोग्य सेवक होने के नाते आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी?

एक मसीही होने के नाते इस बात का भी ध्यान रखें कि हम इस दुनियां के नहीं हैं। इस दुनियां में हमें अनंत काल को भी ध्यान में रखते हुए जीना है। मुझे विश्वास है कि इस लेख को पढ़ने के बाद आपके दृष्टिकोण में कुछ फर्क जरुर आया होगा। हमें परमेश्वर के द्वारा नियुक्त अधिकारियों का सम्मान करना है और अपने विश्वास के साथ समझौता भी नहीं करना है।

शालोम

Anand Vishwas
Anand Vishwas
आशा है कि यहां पर उपलब्ध संसाधन आपकी आत्मिक उन्नति के लिए सहायक उपकरण सिद्ध होंगे। आइए साथ में उस दौड़ को पूरा करें, जिसके लिए प्रभु ने हम सबको बुलाया है। प्रभु का आनंद हमारी ताकत है।

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