What Is Inductive Bible Study? | With Example | Luke 6:46-49 | त्रि-कदमी विवेचनात्मक बाइबिल अध्ययन विधि से बाइबिल कैसे पढ़ें?

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What Is Inductive Bible Study? | With Example | Luke 6:46-49 | त्रि-कदमी विवेचनात्मक बाइबिल अध्ययन विधि से बाइबिल कैसे पढ़ें?

Three Step Inductive Bible Study Method. आज हम बाइबल अध्ययन के लिए त्रि-कदमी विवेचनात्मक विधि के बारे में बात करेंगे, जिसे Inductive Bible Study कहा जाता है। ये बाइबल अध्ययन की ऐसी विधि है जिसका उपयोग करके, आप जहां तक मेरा मानना है कभी भी परमेश्वर के वचन का गलत अर्थ नहीं निकालेंगे। इस प्रकार आप गलत शिक्षाओं को रोकने में भी अपनी भूमिका अदा करेंगे।

बाइबल अध्ययन की और भी कई विधियां हैं, जैसे कि हम पहले तलवार विधि (Sword Method) के बारे में बात कर चुके हैं। पर Inductive Bible Study में एक लेखांश को पढ़ने के लिए, उसका अवलोकन करने के लिए, उसकी व्याख्या करने के लिए और उसका लागूकरण ढूंढने के लिए काफी समय आपको अलग करना होगा। हमारा सुझाव है कि इस विधि का इस्तेमाल करते समय आप धीरे-धीरे हर एक कदम को इस्तेमाल करके आगे बढ़ते रहें।

Bible Study की कोई भी विधि हो सकती है पर अगर हम उसमें से लागूकरण के लिए कुछ भी न निकालें तो हमारे अध्ययन से किसी को भी कोई फायदा नहीं होने वाला। 

विवेचनात्मक बाइबल अध्ययन (Inductive Bible Study) के लिए आपको तीन चरणों से होकर जाना होगा: अवलोकन, व्याख्या और लागूकरण। विवेचनात्मक रीति से बाइबल अध्ययन करने का अर्थ होता है, अधिक जानकारियां खोजना ताकि आपका लागूकरण बिल्कुल सटीक हो।

  • अवलोकन (Observation) – लेखांश क्या कहता है?
  • व्याख्या (Interpretation) – लेखांश का अर्थ क्या है?
  • लागूकरण (Application) – मैं इसका प्रत्युत्तर कैसे दूं?

Inductive Bible Study में हम बारीकी से अध्ययन करना सीखेंगे ताकि हमारे संदेश में से कुछ भी महत्वपूर्ण जानकारी हमसे न छूटे। उसके बाद जब हम इन जानकारियों के आधार पर एक संदेश तैयार कर देंगे तो उसमें भी हम ध्यान देंगे कि कैसे हम उसको प्रस्तुत करेंगे।

इसके लिए हम लूका 6:46-49 के साथ अभ्यास करेंगे।

अवलोकन (Observation) – लेखांश क्या कहता है?

अवलोकन का अर्थ है ध्यानपूर्वक लेखांश या पाठ्यांश का निरीक्षण करना। इसमें हम लेखांश (Passage) का दो प्रकार से अवलोकन करेंगे। हम विषयवस्तु (Content) का और संदर्भ (Context) का भी अवलोकन करेंगे। हमारा अवलोकन (Observation) लेखांश की व्याख्या के लिए नीव का काम करता है।

What Is Inductive Bible Study?

विषयवस्तु (Content) का अवलोकन।

विषयवस्तु का अवलोकन इस प्रकार से हो सकता है कि मान लो आप अपनी बालकनी में खड़े हैं और आप अपने सामने एक पहाड़ को देखते हैं फिर ज्यादा जानकारी के लिए आप उसमें से विवरण को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। जैसे कि उसमें ऊंचाई पर बर्फ गिरी हुई है, सामने पहाड़ पर कई पेड़ दिखाई दे रहे हैं, कुछ देवदार के, कुछ चीड़ के और भी बहुत से प्रकार के।

फिर आप देखते हैं कि इसमें दो तीन सड़कें भी हैं और कुछ लोग हैं जो उन पर चल रहे हैं। आप उनके ड्रेस का रंग आदि भी देख सकते हैं, कुछ गाड़ियां भी चल रही हैं, बस, ट्रक, ऑटो इत्यादि। आगे आप इसमें और भी बहुत सी जानकारियां जुटा सकते हैं। मुझे लगता है कि आप अवलोकन के बारे में समझ गए होंगे। इसी सूत्र को हमें परमेश्वर के वचन को पढ़ते समय भी इस्तेमाल करना है और वचन में से जानकारियों को निकाल कर उन्हें लिखते जाना है। 

सबसे पहले हमें अच्छे से (कम से कम दो या तीन बार) पढ़कर लेखांश (Passage) का सारांश लिखना है। प्रभु से सहायता मांगें कि प्रभु इस लेखांश को समझने में आपकी सहायता करे।

सम्पूर्ण चित्रण – सारांश

यह लेखांश (लूका 6:46-49) आज भी हर एक विश्वासी के लिए एक प्रेरणा है कि यीशु मसीह प्रभु है इसलिए उसका आज्ञापालन बहुत जरूरी है। मसीही लोगों के लिए आज्ञाकारिता वैकल्पिक नहीं हैं। जो उसकी बातों को जीवन में लागू नहीं करता है उसका जीवन खतरे में है। 

विवरण को देखना : लेखांश को दो या तीन बार पढ़ लेने के बाद अब आपके पास उस लेखांश के बारे में एक बड़ी तस्वीर मालूम हो जाती है। उसके बाद हमें कुछ विवरणों पर अपना ध्यान केंद्रित करना होता है, जैसे कि – इसमें कौन-कौन लोग हैं? इसमें क्रिया क्या हो रही है? कौन सी जगह में यह सब कुछ हो रहा है? या किस जगह के बारे में बात हो रही है? समय क्या है? क्या घट रहा है? विभिन्न विवरणों को देखने के लिए हमें छः कक्कार से जानकारियां जुटाना शुरू कर देना है। इस तरह से अवलोकन करने में आपको बाद में इसकी सही व्याख्या और लागूकरण करने में मदद मिलेगी। (छः कक्कार) जैसे कि – कौन? क्या? कब? कहां? क्यों? और कैसे?

इस तरह से लेखांश का अवलोकन करने में आपको समय तो लगेगा पर आपको मालूम होगा कि कुछ सोना प्राप्त करने के लिए लाखों टन मिट्टी भी हटाना पड़ता है। ये काम खुदाई जैसा ही है। याद रखें परिश्रमी को ही अनमोल वस्तुएं मिलती हैं। (नीतिवचन 12:27) आलसी तो बेगार में पकड़े जाते हैं। (नीतिवचन 12:24) हमें परमेश्वर के वचन का अध्ययन करना जरूरी है तभी हम दूसरों तक सही संदेश पहुंचा सकते हैं। प्रयत्न करने में आलसी न हो, आत्मिक उन्माद में भरे रहो। (रोमियों 12:11) आपको याद होगा कि पौलुस क्या कहता है “मैंने सबसे अधिक परिश्रम किया”। (1 कुरिन्थियों 15:10)

विस्तृत वर्णन के लिए छः प्रश्न

कौन? 

  • कौन कह रहा है कि जब तुम मेरा कहना नहीं मानते हो?
  • कौन घर बना रहे थे?
  • कौन सा घर पक्का था?

क्या? 

  • वो लोग क्या बना रहे हैं जो यीशु के पास आते हैं?
  • लोग यीशु को क्या कह रहे थे?
  • क्या जो भी लोग प्रभु यीशु के पास आते थे वे सभी उसका कहना मानते थे? 
  • यहां क्या हो रहा था? लोग यीशु का सुनते तो थे पर कहना नहीं मान रहे थे। 
  • क्या जिसने घर को नीव डालकर बनाया था उसका घर गिरा?
  • आंधी, तूफान, बाढ़ आने पर उस घर का क्या हुआ जिसने बिना नीव के मिट्टी पर घर बनाया था?
  • क्या हम भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं? – (लागूकरन)
  • क्या सभी लोग यीशु की प्रभुता को स्वीकार करते हैं?
  • नीव डालकर घर बनाना क्या दर्शाता है? – (लागूकरन)

कब? 

  • कब यीशु को प्रभु कहना ठीक नहीं है?
  • कब घर की वास्तविक असलियत मालूम हुई? जब बाढ़ आई।

कहां? 

  • बुद्धिमान व्यक्ति अपना घर कहां बना रहा था?
  • मूर्ख व्यक्ति अपना घर कहां बना रहा था?
  • जो यीशु के अनुयाई हैं उन्हें अपना घर कहां बनाना चाहिए? – (लागूकरन)

क्यों? 

  • बाढ़ आने पर क्यों एक घर बना रहा और दूसरा गिर गया?
  • प्रभु यीशु क्यों चाहते हैं कि उनकी बातों को सभी लोग पालन करें? – (लागूकरन)

कैसे? 

  • बुद्धिमान व्यक्ति अपना घर कैसे बना रहा था?
  • मूर्ख व्यक्ति अपना घर कैसे बना रहा था?
  • आज हमें अपने आत्मिक घर को कैसे बनाना चाहिए? – (लागूकरन)
  • कैसे घर हर परिस्थिति में मजबूत रह सकता है?

संकेतों का अवलोकन

अब हमें कुछ संकेतों (Clue) का भी अवलोकन करना है। ये ऐसे शब्द या वाक्य होते हैं जो लेखांश के अर्थ की ओर हमारी अगुवाई करते हैं। पवित्रशास्त्र में अनेक प्रकार के संकेतों का इस्तेमाल हुआ है। इन्हें आप सुराग भी कह सकते हैं। जैसे कि: मुख्य शब्द या वाक्य, दुहराए गए शब्द या वाक्य, तुलना किए गए, विरोधाभास अर्थात जो एक दूसरे के विपरीत होते हैं, उदाहरण, कोई सूची, कोई वर्णन या आज्ञाएं, वादे और चेतावनियां इत्यादि। इन बातों की खोज करने पर हम अच्छे से लेखांश का व्याख्या कर सकते हैं। 

जैसे हम अपने लेखांश में देखते हैं तो हम इसमें कुछ संकेत पाते हैं: 

मुख्य शब्द या वाक्य

  • प्रभु।
  • घर।
  • बाढ़।
  • जब तुम कहना नहीं मानते, यीशु को प्रभु कहने का कोई मतलब नहीं बनता है।
  • कहना मानना।
  • जो भी प्रभु के पास आता है।
  • बुद्धिमान
  • मूर्ख
  • पक्की नीव के साथ घर बनाना।
  • मिट्टी खोदकर, बिना नीव का घर बनाना।
  • एक घर बना रहा। 
  • एक घर गिर कर सत्यानाश हो गया।

दोहराए गए 

  • प्रभु प्रभु।
  • मानना।
  • सुनकर मानना।
  • सुनकर नहीं मानना।
  • घर बनाना।
  • नीव
  • बाढ़

तुलनात्मक 

  • बुद्धिमान और मूर्ख।
  • पक्की नीव और कच्ची नीव।
  • सुनना और मानना।
  • घर का बना रहना और दूसरे का सत्यानाश हो जाना।
  • दो मनुष्य
  • दो घर

वर्णन 

  • जो कोई भी व्यक्ति यीशु के पास आता है उसे सुनकर मानना बहुत जरूरी है।

उदाहरण 

  • बुद्धिमान और मूर्ख घर बनाने वाले।

आज्ञाएं, वादे और चेतावनियां

  • यदि व्यक्ति यीशु की सुनकर मानता है तो उसका घर कोई भी परिस्थिति आने पर मजबूत बना रहेगा। 
  • यदि व्यक्ति यीशु की सुनकर नहीं मानता है तो उसका सत्यानाश होना निश्चित है।
  • बिना आज्ञाकारिता के यीशु को प्रभु कहना बेतुका है।

संदर्भ (Context) का अवलोकन।

अब जबकि हमें विषयवस्तु का अवलोकन कर दिया है तो अब हमें इसके संदर्भ का भी अवलोकन करना होगा। हमें देखना होगा कि लेखक क्या कह रहा है? उसकी पृष्ठभूमि क्या है? उसके लिखने की शैली क्या है? उसके असली सुनने वाले कौन हैं? आसपास के लेखांश इसके बारे में क्या बताते हैं? इत्यादि।

ऐसा करने के पीछे हमारा मकसद है, उस परिस्थिति की वास्तविकता का पता करना। यदि हम सिर्फ विषयवस्तु (Content) का ही अवलोकन के साथ आगे बढ़ते हैं और इसके संदर्भ (Context) का अवलोकन नहीं करते हैं तो यह हमें एक गंभीर गलत समझ की ओर अगुवाई कर सकता है। इसलिए इसकी पृष्ठभूमि की छानबीन करना जरूरी हो जाता है। 

पृष्ठभूमि 

पृष्ठभूमि का पता करने के लिए आपको पहले उस पत्री या किताब को पढ़ना होगा जिसमें से आप लेखांश का अध्ययन कर रहे हैं। इस पत्री, सुसमाचार या किताब के शुरू में, आखिर में, या फिर बीच में भी लेखक और असली सुननेवालों का जिक्र हो सकता है।

लेखक : लूका ही लूका रचित सुसमाचार और प्रेरितों की पुस्तक का लेखक है। पढ़ें लूका 1:1-4, प्रेरितों 1:1

“थियुफिलुस” नाम का शाब्दिक अर्थ है “ईश्वर द्वारा प्रेम किया गया”, लेकिन “परमेश्वर के मित्र” के विचार को वहन करता है।

चूँकि यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि थियुफिलुस एक वास्तविक व्यक्ति था, हम देखेंगे कि हम बाइबल से उसके बारे में क्या जानते हैं और फिर कई सिद्धांतों में से कुछ पर चर्चा करेंगे कि वह कौन हो सकता है। सबसे पहले, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि लूका उसे “सर्वोत्तम” के रूप में संबोधित करता है, एक शीर्षक जिसका उपयोग अक्सर किसी सम्मान या पद के लिए किया जाता है, जैसे कि एक रोमन अधिकारी। फेलिक्स (प्रेरितों के काम 23:26; प्रेरितों के काम 24:2) और फेस्तुस (प्रेरितों 26:25) को संबोधित करते समय पौलुस ने इसी शब्द का प्रयोग किया। इसलिए, सबसे आम सिद्धांतों में से एक यह है कि थियुफिलुस संभवतः रोमन सरकार में एक रोमन अधिकारी या उच्च पदस्थ अधिकारी था।

सुनने वाले : थियुफिलुस (loved by God) और बाकी कलीसिया और आज हम सब। 

लूका 6:46-49 – बहुत से लोग यीशु की शिक्षाओं को सुन तो रहे थे पर लागू करने वाले बहुत कम थे। 

लेखक और सुननेवाले के बीच संबंध

लूका का जिक्र पौलुस अपनी पत्रियों में संलग्न करता है। वो एक वैद्य भी था, साथ में पौलुस का सहकर्मी भी था।

लिखने की शैली 

हमारी पृष्ठभूमि के अवलोकन में यह भी महत्वपूर्ण है कि हम लिखने की शैली का भी अवलोकन करें। बाइबल के लेखकों ने, बाइबल को लिखने में विभिन्न शैलियों का इस्तेमाल किया है।

पुराने नियम को पांच प्रकार की लिखावटों में विभाजित किया जा सकता है:

  • वर्णनात्मक या इतिहास।
  • व्यवस्था या विधि।
  • काव्यात्मक। 
  • भविष्यवाणी
  • बुद्धि।

नए नियम को चार प्रकार की लिखावटों में विभाजित किया जा सकता है:

  • सुसमाचार।
  • इतिहास।
  • पत्रियां।
  • प्रकाशन या भविष्यवाणी।

कई बार एक पुस्तक में एक से अधिक लेखन शैली भी हो सकती है। उदाहरण के लिए, योना की पुस्तक एक भविष्यवाणी की पुस्तक है और यह पुस्तक इतिहास से भी संबंधित है। कई बार लेखांश में दो या उससे अधिक साहित्यिक शैलियों का भी इस्तेमाल किया हो सकता है। जैसे कि निर्गमन 15 अध्याय। जहां पर हम एक गीत को पाते हैं। हालांकि यह एक ऐतिहासिक घटना है जो यह बताती है कि मूसा और इस्राएलियों ने क्या किया। इस अध्याय में हम ऐतिहासिक और काव्यात्मक लेखन शैली को पाते हैं। 

लूका रचित सुसमाचार की लेखन शैली

लूका एक सुसमाचारीय पुस्तक है। इसमें लूका ने एक विस्तृत वर्णन देने का प्रयास किया है। सुसमाचार की पुस्तकें विश्वासियों को शिक्षा देने तथा उत्साह के लिए लिखी गई है तथा दूसरों को मसीह में विश्वास के लिए बुलाने के लिए लिखी गई है।

आसपास के लेखांश का अवलोकन (लूका 6:17-45, लूका 7:1-10)

जब आप बाइबल में किसी लेखांश का अध्ययन करते हैं तो यह भी जरूरी हो जाता है कि आप उसके आसपास के अध्ययायों या लेखांशो का अध्ययन करें। बहुत बार कई लोग बिना आसपास के लेखांशों का अध्ययन किए किसी एक लेखांश पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। यदि हम भी ऐसा करते हैं तो ये संभव है कि कुछ जरूरी अवलोकन हमसे छूट जाए।

आसपास के लेखांश जो हमारे लेखांश को घेरते हैं वे भी हमारे लेखांश के अर्थ पर बहुत बड़ा प्रभाव डालते हैं। हमारा आसपास के लेखांशों का ये अवलोकन हमारी व्याख्या करने में भी काफी मददगार होगा। इसलिए इस कदम को भी हमें सावधानी पूर्वक करना चाहिए।

हमारी आसपास की आयतें हमारी मदद कैसी करती हैं लोगों के बारे में जानने के लिए जिनसे यीशु बात कर रहे थे? 

ये आयतें हमें बताती हैं कि यीशु के पास बहुत से लोग विभिन्न जगहों से आए हुए थे, उनके चेले उनके साथ थे, सारे यहूदिया, यरुशलेम, सूर और सैदा के बहुत से लोग जो उसकी सुनने और अपनी बीमारियों से चंगा होने के लिए आए थे। सब यीशु से चंगाई को पाना चाहते थे।

पर इतनी शिक्षाओं के बावजूद भी लोग यीशु की बातों पर अमल नहीं कर रहे थे। इसलिए यीशु को उन्हें यह दृष्टांत देना पड़ा ताकि वे समझें कि प्रभु यीशु का सुनकर उसका आज्ञापालन करना बहुत जरूरी है। जब हम ऐसा करते हैं तो उसकी प्रभुता को भी स्वीकार करते हैं। 

व्याख्या – लेखांश के अर्थ को समझना

परमेश्वर के वचन की सच्चाई हर युग हर पीढ़ी के लिए है। ये एक कालातीत सच्चाई है। यह सच्चाई सभी संस्कृतियों के लिए है और सभी लोगों के लिए है। परमेश्वर का वचन जीवित है। इसका अर्थ है कि जो संदेश एक विशेष सुननेवालों को दिया गया था, उस संदेश की सच्चाई या सिद्धांत आज के लोगों के लिए भी लागू होता है। इसलिए जब हम लेखांश की व्याख्या की ओर बढ़ रहे हैं तो इसमें हमारा लक्ष्य होगा: असली संदेश को समझना और कालातीत संदेश को समझना। 

What Is Inductive Bible Study?

इस व्याख्या चरण में हम उन अवलोकनों से निष्कर्ष निकालने की शुरुआत करेंगे, अर्थात हम उसका अर्थ ढूंढने का प्रयास करेंगे। फिर अंतिम चरण में हम उस सच्चाई को लागू करना भी सीखेंगे। 

  • असली संदेश को समझना।
  • कालातीत संदेश को समझना।

असली संदेश को समझना

व्याख्या चरण में हमारा पहला लक्ष्य यह है, लेखक के मकसद को समझना। लेखक असली सुननेवालों से क्या कहना चाहता था। ये शब्द उनके लिए क्या महत्व रखते थे? इस सन्देश ने उन्हें कैसे प्रभावित किया? इस संदेश को सुनने के बाद उन्होंने इसका प्रत्युत्तर कैसे दिया? अगर हमें लेखांश की सही व्याख्या करनी है तो अच्छे व्याख्या प्रश्न भी पूछने होंगे और उनके उत्तर भी लेखांश में से प्राप्त करने होंगे। 

हम जबकि लेखांश की व्याख्या चरण में हैं तो सही से व्याख्या करने के लिए हमें प्रभु की सहायता की आवश्यकता भी है इसलिए प्रभु से प्रार्थना करें कि सही व्याख्या करने में वो हमारी सहायता करे। 

अच्छे व्याख्या प्रश्नों को पूछना। 

अभी हम व्याख्या करने वाले हैं। सही व्याख्या करने के लिए हमें अच्छे व्याख्या प्रश्नों को पूछना होगा और इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करना होगा। हमने जो अवलोकन किए हैं उसके बाद हम इस तरह से उस लेखांश की व्याख्या के लिए प्रश्न पूछ सकते हैं: 

  • यह महत्वपूर्ण कैसे है?
  • इसका अर्थ क्या है? 
  • क्यों व्यक्ति के ऐसा किया?
  • क्यों व्यक्ति ने ऐसा कहा?
  • इस घटना का समय कैसे महत्वपूर्ण है? 
  • इस लेखांश के पहले और बाद के पाठ इससे कैसे संबंध रखते हैं?
  • लेखक सुनने वालों को क्या समझाना चाहता था? 
  • ये आज्ञा, वादा, चेतावनी सुनने वालों के लिए कैसे महत्वपूर्ण थी? 
  • लेखक और सुनने वालों में आपस में संबंध कैसा था? 
  • क्यों इस बात को बार बार दोहराया गया है?
  • इस संदेश ने उनके जीवनों को कैसे प्रभावित किया? 
  • क्यों लेखक ने इसे इस तरीके से व्यवस्थित किया है।

लूका 6:46-49 से व्याख्या प्रश्न 

  1. क्यों प्रभु यीशु का सुनकर मानना जरूरी है?
  2. सुनकर मानना कैसे महत्वपूर्ण है?
  3. सुनकर मानने का अर्थ क्या है?
  4. बुद्धिमान मनुष्य का घर क्यों नहीं गिरा?
  5. मूर्ख व्यक्ति का घर क्यों गिर गया?
  6. बाढ़ क्या प्रदर्शित करती है। 
  7. भूमि को गहरी खोदने का क्या अर्थ है?
  8. क्यों भूमि को गहरा खोदना आवश्यक है?
  9. क्या कारण है कि दूसरे बनाने वाले का घर सत्यानाश हो गया?
  10. प्रभु शब्द का क्या तात्पर्य है?

उत्तर प्राप्त करना 

अब जबकि हमने व्याख्या प्रश्नों को निकाला है तो अब इसके उत्तर भी लिखना जरूरी है। व्याख्या करते समय ध्यान दें कि इसकी व्याख्या पवित्रशास्त्र को ही करने दें। बाइबल पहला और भरोसेमंद स्थान है जहां आप लेखांश का उत्तर प्राप्त कर सकते हैं। इसके बाद हमारे पास एक सवाल आता है कि बाइबल में कहां देखें? सबसे पहले लेखांश में, उसके बाद आपको आसपास के लेखांशों में देखना है, फिर उस पूरी पुस्तक को पढ़ना है उसके बाद उस लेखक द्वारा लिखी कोई दूसरी पुस्तक को भी उस लेखक को जानने के लिए पढ़ सकते हैं। 

उदाहरण के लिए आप भजन संहिता 51 पढ़ रहे हैं जो कि दाऊद का एक भजन है इसके अर्थ को समझने के लिए आपको इसके इतिहास में जाने की जरूरत है ताकि आप इसका सही अर्थ निकाल सकें। इब्रानियों 11:24-28 में लेखक मूसा का जिक्र करता है तो इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए हमें निर्गमन की पुस्तक का अध्ययन करना होगा ताकि हम सही व्याख्यान कर पाएं। 

बाइबल में उत्तर ढूंढने के बाद आप बाइबल शब्दकोश, बाइबल टीका टिप्पणियों में जाकर भी मदद ले सकते हैं। पर याद रखें सबसे पहले आपको बाइबल में ही ढूंढना है। आजकल कुछ लोगों की आदत हो गई है सीधे गूगल या यूट्यूब पर अपने सवालों के जवाब ढूंढना जो कि आपको गलत अगुवाई कर सकते हैं। मैं ऐसे लोगों को आलसी मसीही कहना पसंद करूंगा क्योंकि इनको बाइबल को पढ़ने या ढूंढने में आलस लगता है। और ऐसे ही लोग जल्दी से गलत शिक्षाओं के शिकार भी हो जाते हैं। इंटरनेट में सभी जानकारियां सही नहीं होती हैं। आपको यह जानना होगा कि हमारा विरोधी इसका बहुत ही गलत तरीके से इंटरनेट का फायदा उठा रहा है। 

उदाहरण के लिए आप गूगल से पूछते हैं कि यीशु कौन था? तो गूगल उन लेखों को आपको बताएगा जो लोगों ने यीशु के बारे में लिखे हुए हैं। याद रखिए इनमें ऐसे लेख भी होंगे जो कि किसी मसीही व्यक्ति ने नहीं लिखे होंगे। आप कल्पना ही करके देखें कि वो व्यक्ति जिसने कभी बाइबल को नहीं पढ़ा और कभी कलीसिया में नहीं गया, जिसका यीशु के साथ कोई व्यक्तिगत संबंध नहीं है, वो आपको यीशु के बारे में क्या बताएगा?

हां हो सकता है कि उसके पास आपका उत्तर हो, पर ये उत्तर मनगढ़ंत भी हो सकता है या दूसरे से सुना हुआ जो यीशु के बारे में जानता ही नहीं हो। जब किसी व्यक्ति ने यीशु को जाना ही नहीं है, उसको चखा ही नहीं है, उसके साथ व्यक्तिगत अनुभव नहीं है, तो वो व्यक्ति यीशु के बारे में क्या बता पाएगा? प्रश्नों को पूछते समय इस बात का भी ध्यान रखें कि इन प्रश्नों को उत्तर सर्वप्रथम लेखांश में हो या आसपास के लेखांश में हो। 

अच्छी व्याख्या के लिए इस क्रम को ध्यान दें।

  • सर्वप्रथम हमारे लेखांश का अवलोकन देखें।
  • उसके बाद लेखांश के पहले या बाद के चारों तरफ के लेखांश देखें।
  • अन्य लेखांश या पुस्तकें देखें जो उसी लेखक के द्वारा लिखी गई हों।
  • अन्य संबंधित लेखांश या पुस्तकों में ढूंढें जैसे कि हमने भजन सहिता 51 और इब्रानियों 11 के बारे में बात की थी। 
  • अंत में आप शब्दकोश, बाइबल टीका इत्यादि से भी मदद ले सकते हैं।

हमने सबसे पहले बाइबल में से ही देखना है और यही हमारा मूल स्त्रोत होना चाहिए।

लूका 6:46-49 से उत्तर

  1. क्योंकि वो प्रभु है, स्वामी है।
  2. खाली सुनने से कोई फायदा नहीं होगा। आज्ञाकारिता से ही फायदा होगा।
  3. आज्ञाकारिता।
  4. क्योंकि वह नीव खोदकर चट्टान पर बनाया गया था।
  5. उसका घर कच्ची नीव होने के कारण गिर गया।
  6. जीवन की हर एक परिस्थिति।
  7. यीशु के वचनों का पालन करना। 
  8. यदि हम अपना घर मजबूत रखना चाहते हैं और हर परिस्थिति में स्थिर रहना चाहते हैं।
  9. क्योंकि उसने सुनकर भी माना नहीं ये दर्शाता है कि उसके घर की नीव कच्ची थी, जिसकी वजह से घर का सत्यानाश हो गया।
  10. प्रभु शब्द से तात्पर्य है, प्रभुता करने वाला, स्वामी, मालिक। जैसा कि हमने आसपास के लेखांशों से देखा कि प्रभु यीशु को हर चीजों पर अधिकार है। 

मूल संदेश का अर्थ

इस उदाहरण से यीशु अपने उन सुनने वालों से कह रहा था जो हमने (लूका 6:17-45, लूका 7:1-10) में देखा था। कि प्रभु यीशु की प्रभुता को स्वीकार करने का अर्थ था कि वो उसकी आज्ञा भी माने। वे लोग चंगाई पाने के लिए या शिक्षा के लिए यीशु के पास आते तो थे पर उनके प्रति आज्ञाकारी नहीं थे। इसलिए यीशु को ये बताना पड़ा कि आज्ञाकारिता उनके जीवन को मजबूत बनाने के लिए ज़रूरी है। नहीं तो उनका जीवन मजबूत नहीं होगा।

कालातीत संदेश को समझना

कालातीत संदेश का अर्थ है जो आज के लोगों, संस्कृतियों के लिए भी लागू होता है। संपूर्ण पवित्रशास्त्र हमें उपदेश, समझाने, सुधारने और धार्मिकता की शिक्षा के लिए लाभदायक है ताकि परमेश्वर का जन किसी भी संस्कृति में या किसी भी पीढ़ी में भले काम करने के लिए तैयार हो जाए। (2 तिमुथियुस 3:16-17) इसलिए जब भी हम किसी लेखांश को पढ़ रहे हैं तो ये पूछना काफी मददगार होगा, कौन-कौन सी महत्वपूर्ण सच्चाईयां हैं जिसे परमेश्वर चाहता है कि आज के लोग भी इसमें से प्राप्त करें? 

उदाहरण के लिए हम कुछ आयतों को देखेंगे। मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि आप बाइबल में से इन आयतों को पढ़ लें।

इफिसियों 5:18 में पौलुस इफिसियों की कलीसिया से कहता है कि वे मदिरापान न करें। पौलुस इस बात को जानता था कि मदिरा का सेवन विश्वासी के जीवन में आत्मा के नियंत्रण पर बाधा पहुंचाएगा। इसके सामान्य लक्षण हैं: आत्म-संयम खोना, व्यर्थ का न्याय करना, मौखिक गालियां इत्यादि। ये सच्चाई इफिसियों के विश्वासी के लिए भी महत्वपूर्ण थी और आज हम सबके लिए भी महत्वपूर्ण है। इसलिए आज विश्वासियों को ऐसी नशीली चीजों के सेवन से बचना चाहिए जो व्यक्ति को अभक्ति की ओर ले जाती हैं।

यूहन्ना 14:26 में यीशु अपने शिष्यों से वादा करता है कि पवित्रात्मा आ रहा है जो उनका सहायक और शिक्षक होगा। यही सच्चाई हम सबके लिए भी मान्य है कि पवित्र आत्मा आज हमारा भी शिक्षक और सहायक है। वह आज भी हमें परमेश्वर की बातों में से सिखाता है। 

भजन संहिता 56:3 में राजा दाऊद प्रार्थना करता है कि जिस समय मुझे डर लगेगा, मैं तुझ पर भरोसा रखूंगा। दाऊद इस बात को जानता था कि परमेश्वर पर भरोसा करना, डर का प्रत्युत्तर है। और आज या कालातीत सच्चाई हमारे लिए भी लागू होती है। जब ऐसी परिस्थिति में भी हम परमेश्वर पर भरोसा रखें। 

विलापगीत 3:23-24 में यिर्मयाह ने इज्राएलियों को परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को स्मरण कराया कि उसकी करुणा हमारे लिए हर दिन नई होती जाती है। आज हमारे लिए भी यही सच्चाई है जो हम अपने जीवनों में महसूस कर सकते हैं। 

पवित्रशास्त्र में कुछ ऐसे भी लेखांश या पाठ हैं जिनका आज के लोगों के साथ सीधे तौर पर तो कोई संबंध नहीं है पर सिद्धांत आज के लोगों के लिए भी वैसे ही हैं जैसे उन लोगों को दिए गए थे। 

उदाहरण के लिए रोमियों 16:16 में पौलुस ने मसीहियों को आज्ञा दी कि आपस में पवित्र चुम्बन से नमस्कार करें। हममें से कई लोग इन आज्ञाओं से बचना चाहेंगे क्योंकि ये हमारी संस्कृति में लागू नहीं होती हैं। परंतु इस आज्ञा में एक सच्चाई जरूर है जो आज की कलीसिया से भी संबंध रखती है। वो है परमेश्वर के एक परिवार के समान आपस में स्नेह प्रकट करना। 

अय्यूब 1:5, 8 में अय्यूब का लेखक बताता है कि अय्यूब अपने बच्चों के पापों के लिए बलिदान चढ़ाया करता था। परमेश्वर आज के माता-पिता से यह नहीं चाहता है कि वे इस प्रकार का कार्य करें परंतु ये जरूर चाहता है कि मसीही माता-पिता विश्वासयोग्यता के साथ प्रतिदिन अपने बच्चों के लिए परमेश्वर के सामने मध्यस्था करें। 

लैव्यव्यवस्था 11 का सम्पूर्ण अध्याय बताता है कि उनको क्या खाना है, क्या नहीं खाना है। पर इसमें से भी आज ले लिए जो कालातीत संदेश है वह है पवित्रता। परमेश्वर स्वयं पवित्र है वो चाहता है कि उसके लोग भी पवित्र बने रहें।

हमने कुछ उदाहरणों को यह समझने के लिए देखा कि किस प्रकार हर एक संदेश में एक कालातीत सच्चाई है जो आज के लोगों के लिए भी लागू होती है। इसलिए जब भी आप कोई लेखांश पढ़ें तो वहां कालातीत सच्चाई को भी अवश्य ढूंढें जिसे आप लागू कर सकते हैं। कालातीत सच्चाई परमेश्वर, उसका चरित्र, उसका उद्देश्य, मार्ग, वह क्या चाहता है, क्या नहीं चाहता है इसके बारे में है और लोगों के बारे में भी कि लोग/विश्वासियों/गैर – विश्वासियों के बारे में भी है कि हमारा स्वभाव या हम कैसे परमेश्वर से संबंधित हैं। 

कौन सी महत्वपूर्ण सच्चाईयां है जिसे परमेश्वर चाहता है कि आज के लोग भी लेखांश में से प्राप्त करें?

लूका 6:46-49 से कालातीत सच्चाई

इस लेखांश में हम आज्ञाकारिता के महत्व को सीख सकते हैं। आज्ञाकारिता वैकल्पिक नहीं है जब हम प्रभु यीशु के अनुयाई हैं।यदि हम उसके प्रति निरंतर अनाज्ञाकारी रहते हैं तो हम जीवन में आने वाली विशेष परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाएंगे। 

अन्य सच्चाईयां

  • यीशु के वचनों को सुनकर उनपर अमल करना बहुत जरूरी है। 
  • यीशु प्रभु है।
  • बुद्धिमानी से अपने घर का निर्माण करना है।

उपयोग/लागूकरन – सत्य के प्रति प्रतिक्रिया करना।

यह चरण हमारे Inductive Bible Study का आखरी चरण है। हमें लेखांश का अवलोकन किया, उसके बाद हमें उसका अर्थ खोज निकाला, अब इसके बाद इन सच्चाइयों को अपने जीवन में लागू करना बहुत जरूरी है। अन्यथा हमारे अध्ययन करने का कोई लाभ नहीं होगा। हमारे बाइबल अध्य्यन का उद्देश्य सिर्फ ज्ञान प्राप्त करना नहीं है बल्कि इस ज्ञान या सत्य को जानने के बाद परिवर्तित होना है। परमेश्वर की इच्छा है कि हम प्रतिदिन अंश-अंश करके यीशु जैसा हो जाएं। (फिलिप्पियों 2:5, 2 कुरिंथियों 3:18)

What Is Inductive Bible Study?

हालांकि हमारे जीवन में परिवर्तन, पवित्र आत्मा द्वारा लाया जाता है, फिर भी इसमें हमारे सहयोग की आवश्यकता भी होती है। जैसे ही हम वचन को लागू करते हैं और परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं वैसे ही पवित्र आत्मा हमारे जीवन में बदलाव लाता है। 

सत्य पर मनन करना। 

लागूकरण लेखांश पर मनन करने से शुरू होता है। इसमें हम लेखांश में उपलब्ध कालातीत सच्चाइयों के बारे में सोचेंगे और मनन करेंगे कि इस लेखांश से हमने क्या सीखा है। लागूकरण बाइबल अध्ययन का सबसे व्यक्तिगत चरण है। 

प्रार्थनापूर्वक उस सत्य को चुने जो आपसे बातें करता है। 

लेखांश का अवलोकन करने पर जो सत्य परमेश्वर ने हमारे सामने लाया है अब उस सत्य को अपने जीवन में लागू करने का समय आ गया है। इसलिए प्रभु से मांगें कि वह आपका मार्गदर्शन करे कि कौन सा सत्य वह चाहता है कि आप अपने जीवन में लागू करें। प्रार्थनापूर्वक सोचें कि यदि कोई ऐसी विशेष सच्चाई है जिसका इस्तेमाल परमेश्वर आपके हृदय से बातें करने के लिए कर रहा है तो उस सत्य को चुने जो आप महसूस करते हैं कि प्रभु ने आपको उस तक मार्गदर्शन किया है।

प्रार्थनापूर्वक अपने जीवन को सत्य की रोशनी में जांचें। 

लेखांश की सच्चाईयों पर मनन करने के बाद एक विशेष सच्चाई पर केंद्रित होकर आप अपना कुछ समय सत्य की रोशनी में जांचने लगेंगे क्योंकि परमेश्वर का वचन जो कहता है कि वह जीवित, प्रबल, हर एक दोधारी तलवार से भी चोखा है; और प्राण, आत्मा को, गांठ-गांठ और गूदे-गूदे को अलग करके आए पार छेदता है और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है। (इब्रानियों 4:12) परमेश्वर से प्रार्थना में मांगें कि जैसे परमेश्वर ने आप पर सत्य को प्रकट किया है, उसमें आप आज्ञाकारी हो जाएं। कुछ प्रश्नों को अपने आप से पूछें: 

लूका 6:46-49 से प्रार्थनापूर्वक अपने जीवन को सत्य की रौशनी में जांचना।

जब मैंने मेरे जीवन की परीक्षा ली, मैंने भी कई बार प्रभु यीशु को प्रभु तो पुकारा है पर कई बार मैंने उसकी आज्ञा का पालन नहीं किया है। कई बार जो मैं बोलता हूं उसके प्रति अचेत रहा हूं। यदि मैं उसको अपने मुंह से प्रभु स्वीकार करता हूं तो मुझे अपने हृदय से भी उसे प्रभु स्वीकार करने की जरूरत है। प्रभु आप मेरी सहायता करें ताकि मैं ह्रदय से भी आपकी प्रभुता को भी स्वीकार कर सकूं।

सत्य के प्रति प्रतिक्रिया करना। 

जब हम परमेश्वर को अनुमति देते हैं कि सत्य के द्वारा हमसे बातचीत करे तो हमारा प्रत्युत्तर या तो तुरंत या फिर बाद में हो सकता है। जो कुछ भी परमेश्वर ने हमें दिखाया है अब तुरंत धन्यवाद करते हुए और उसके साथ सहमत होते हुए प्रत्युत्तर देना है। ध्यान रखें कि हमें सिर्फ सुनने वाले ही नहीं बनना है बल्कि चलने वाले भी बनना है क्योंकि सुनने वाले सिर्फ अपने आप को धोखा देते हैं। (याकूब 1:22)

परमेश्वर को उत्तर देना।

परमेश्वर के वचन के साथ सहमत होना।

अब जो भी सत्य को प्रभु ने आपके सामने लाया है और आपने उस पर मनन किया है अब आपको उस सत्य के साथ सहमत भी होना है। यदि आप उस सत्य के साथ संघर्ष कर रहे हैं तो हो सकता है कि यह आपके लिए कठिन हो कि आप इस सत्य को स्वीकार करें। इसमें आपको परमेश्वर के साथ ईमानदार होने की आवश्यकता है।

अपने हृदय से परमेश्वर को जवाब दें और उन कठिनाइयों को बांटें। परमेश्वर से मांगें कि वह आपके हृदय को नम्र बनाएं ताकि आप सच्चाई को स्वीकार कर सकें। अपने आपको समर्पित कर दें। परमेश्वर को अनुमति दें कि आपको दोष व अपराध से शुद्ध करें। (1यूहन्ना 1:9) 

परमेश्वर का धन्यवाद करें। 

दूसरा प्रत्युत्तर जो सच्चाई के लिए है वो है स्तुति और धन्यवाद देना। नहेम्याह में हम देखते हैं कि जब वे लोग बंधुवाई से वापस लौटे, तो एज्रा ने उनको वचन सुनाना शुरू कर दिया। जब उन्होंने वचन को सुना तो उन्होंने अंगीकार किया और आराधना करने लगे। (नहेम्याह 9:3) 

परमेश्वर के निर्देश को ढूंढना। 

अब उस सत्य में परमेश्वर के निर्देश को ढूंढें। परमेश्वर कैसे चाहता है कि आप उस सत्य के लिए प्रत्युत्तर दें? हो सकता है कि उस सत्य के द्वारा परमेश्वर आपके ज्ञान को बढ़ाना चाहता है, या दूसरों के लिए क्षमा करना, या फिर परमेश्वर का धन्यवाद और स्तुति करना। या हो सकता है इस सच्चाई के द्वारा परमेश्वर आपको उत्साहित करना चाहता हो, या पाप से बचने के लिए प्रेरणा दे रहा हो, या आज्ञापालन के लिए प्रोत्साहित कर रहा हो। या हो सकता है कि किसी उदाहरण का अनुसरण करने के लिए आपको प्रेरित करे, या अपनी गवाही बांटने के लिए।

परमेश्वर के वचन में जो आपने अध्ययन किया हो, जरूर उसमें कुछ न कुछ निर्देश तो होगा ही। इसलिए सावधानी से अपने लिए निर्देश ढूंढें और उसके प्रति आज्ञाकारी हो जाएं। देरी से आज्ञापालन भी अनाज्ञाकारिता ही कहलाती है।

लूका 6:46-49 से निर्देश।

लूका 6:46-49 का अध्ययन करते समय परमेश्वर ने मेरी सहायता की कि कई बार मैं भी बिना आज्ञाकारिता के यीशु को प्रभु प्रभु बोलता रहता हूँ। यदि यीशु मेरे जीवन का प्रभु है बिना आज्ञाकारिता के मसीही जीवन जीना बहुत खतरनाक है।

अपने लागूकरण की योजना बनाएं। 

परमेश्वर के साथ सहमत होना और धन्यवाद करना ऐसी प्रतिक्रियाएं हैं जो परमेश्वर के वचन की सच्चाई के प्रति गंभीर प्रतिक्रियाएं हैं। नियमित तौर पर लागूकरण आपके जीवन में परिवर्तन को लाता है। इसमें आपको विश्वासयोग्य होने की जरूरत है। 

जब भी आप अपने लिए लागूकरण की योजना बनाते हैं तो आपकी योजना को व्यक्तिगत, विशेष और वास्तविक होना चाहिए। इसमें मुझे, मैं, मेरा इत्यादि कथन शामिल होना चाहिए। जैसे कि हम लूका में से पढ़ रहे हैं कि बिना यीशु की प्रभुता को स्वीकार किए मसीही जीवन खतरनाक होता है।

आपके लागूकरण के लिए आपको अपनी योजना को SMART बनाना होगा। S – Specific, M – Measurable, A – Attainable, R – Realistic, T – Timebound. या आप PSR भी बना सकते हैं

  • व्यक्तिगत (Personal)
  • विशेष (Specific)
  • वास्तविक (Realistic)

किसी ने इस प्रकार कहा है: यदि आप योजना बनाने में असफल हो रहे हैं तो आप असफल होने की योजना बना रहे हैं। इसलिए यदि आप परमेश्वर के जीवित वचन का महत्व समझते हैं तो आप नियमित तौर पर इसके अध्ययन के लिए समय भी निकलेंगे। अभी हम जिस उदाहरण लेखांश की बात कर रहे हैं वैसे ही आपको हर लेखांश जो आप पढ़ते हैं उस में से लागूकरण की योजना को बनाना है। 

लूका 6:46-49 में से लागूकरण: 

आज्ञाकारी होने लिए वचन का ज्ञान होना चाहिए। उसके लिए वचन का नियमित अध्ययन करना जरुरी है। मैं वचन के प्रति आज्ञाकारी होने के लिए प्रतिदिन सुबह 6:00 बजे 20 मिनट बाइबल को पढ़ने और मनन करके के लिए निकलूंगा। इसके लिए मैं पहले कुलुस्सियों की पत्री से शुरू करूंगा और उसके बाद बाकी बाइबल को भी अलग अलग पुस्तकें पढ़ता रहूंगा ताकि मेरे लिए आज्ञाकारी होना आसान हो। 

सत्य को जीना। 

लागूकरण ही के द्वारा परमेश्वर के वचन की सच्चाई हमारे जीवन का मार्ग बन जाती है। परमेश्वर का वचन बहुत ही व्यक्तिगत (Personal) और व्यवहारिक (Practical) है। परमेश्वर उस सच्चाई के द्वारा हमारे जीवन में व्यवहारिक तौर पर परिवर्तन करना चाहता है। इसलिए जब हम उस सत्य को अपने जीवन में लागू करते हैं उसके बाद हमारे जीवन में उसके परिणाम भी दिखाई देंगे। 

विश्वास में कदम बढ़ाएं। 

विश्वास में कदम बढ़ाने के लिए आपको दो काम करने होंगे। आपको परमेश्वर पर निर्भर होना होगा और आज्ञापालन के कदम उठाने होंगे। (Trust and Obey)

परमेश्वर पर निर्भर रहना। 

परमेश्वर का पवित्रआत्मा हममें परमेश्वर की इच्छा में आगे बढ़ने के लिए बल प्रदान करता है। पौलुस बताता है कि परमेश्वर ही है जो अपनी इच्छा के निमित तुम्हारे मन में इच्छा और काम दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है। (फिलिप्पियों 2:13) पौलुस यह भी बताता है कि परमेश्वर ने आपके जीवन में जो अच्छा काम शुरू किया है उसे पूरा भी करेगा। (फिलिप्पियों 1:6) इसलिए हमें परमेश्वर पर निर्भर होना है उस सत्य के द्वारा परिवर्तित होने के लिए जो लेखांश में परमेश्वर ने हमारे सामने लाया है। परमेश्वर विश्वासयोग्य है जो कुछ करने के लिए परमेश्वर हमें बुलाता है वह उसे पूरा भी करेगा। (1थिस्सलुनीकियों 5:24)

आज्ञापालन के लिए कदम उठाना। 

अब जो सत्य आपके सामने है उसको लागू करने में आपको कदम उठाना है। आप उसके लिए कदम उठाने के लिए उतरदायी हैं। अपने आप से पूछें कि क्या मैं आज्ञाकारिता में विश्वास योग्यता के कदम उठा रहा हूं? 

अपनी प्रगति की जांच करना।

प्रोत्साहन तथा जवाबदेही के द्वारा। 

जैसे ही हम आज्ञाकारिता में चलकर जीने लगते हैं तो हमें हमारी प्रगति की जांच भी करना चाहिए। इसके लिए आप अपने किसी करीबी मसीही के साथ जवाबदेह हो सकते हैं। यदि आप सच में अपने जीवन और योजनाओं के प्रति गंभीर हैं तो आपके पास जवाबदेही के लिए कोई न कोई होना चाहिए जो आपको समय समय पर उत्साहित कर सके और परमेश्वर के वचन के अनुसार मार्गदर्शन कर सके।

व्यक्तिगत मूल्यांकन के द्वारा।

आपको स्वयं अपने साथ भी विश्वासयोग्य होना होगा, तभी आप सच्चाई से अपनी प्रगति का मूल्यांकन कर पाएंगे। आप अपने आप से पूछें कि क्या मैं अपनी योजनाओं में प्रगति कर रहा हूं। वो क्या है जो मुझे आगे बढ़ने से रोक रहे हैं? 

सारांश

मसीह में प्रियों, मैं आशा करता हूं कि बाइबल अध्ययन की यह विवेचनात्मक विधि आपकी बाइबल अध्ययन में काफी उपयोगी साबित होगी। मेरा आपसे निवेदन है कि आप परिश्रम करते रहें। और अच्छी अध्ययन आदतों का अभ्यास करते रहें। जब आप किसी लेखांश का अवलोकन करते हैं, उसके बाद व्याख्या करते हैं और अंत में लागूकरण ढूंढते हैं तो उसके बाद उस लेखांश से आप मुख्य विचार को निकालें जो कि आपका विषय बन जाता है। उसके बाद उसके लिए प्रस्तावना लिखें, फिर संदेश को समझाने के लिए मुख्य भाग या बिंदु और अंत में उसका निष्कर्ष लिखें। इस प्रकार आप के पास अब नए-नए संदेश होंगे।

बाइबल आधारित संदेश तैयार करने के लिए मूल कदम।

  • प्रार्थनापूर्वक एक लेखांश चुने।
  • लेखांश पढ़ें और अध्ययन करें।
  • संदेश की एक रूपरेखा तैयार करें। 
  • पूरे संदेश को लिखें। 
    • प्रस्तावना
    • संदेश का मुख्य भाग
    • निष्कर्ष।

इस प्रकार से अध्ययन करने से आप के जीवन में भी काफी बदलाव आएगा और मसीह के साथ निकटता महसूस करेंगे और आप अपने कार्यक्षेत्र में दूसरों के लिए भी आशीष का कारण होंगे। प्रभु आपको आशीष दे। 


Outline for Luke 6:46-49

मुख्य विचार: यीशु मसीह प्रभु है उसकी बातें सुनना ही नहीं बल्कि मानना भी महत्वपूर्ण है।

संदेश का मुख्य भाग: 

यीशु मसीह प्रभु है। यह हमें उनकी शिक्षाओं से और उनके कार्यों से जैसे कि सूबेदार के सेवक को चंगा करना, यह बात दर्शाता है कि उसके वचन में सामर्थ है। उसने विधवा के पुत्र को जीवित किया, पापियों को क्षमा किया, दुष्टात्माओं को निकाला इत्यादि। यह सब बातें उसके प्रभुत्व और अधिकार और सामर्थ्य को दर्शाते हैं कि वह प्रभु है उसकी बातें सुनना ही नहीं मानना भी महत्वपूर्ण है।

सहायक बिंदु

  • जो यीशु के पास आता है उसको यीशु का मानना भी जरूरी है।
  • जो यीशु की मानता है वह बुद्धिमान व्यक्ति के समान है जो अपना घर चट्टान पर नीव खोदकर बनाता है।
  • उसके आत्मिक जीवन को कोई समस्या या सताव नष्ट नहीं कर सकता। 
  • जो व्यक्ति यीशु की नहीं मानता उसने अपना घर मिट्टी पर बनाया अर्थात उस आदमी के जीवन की नींव कच्ची है। उसके आत्मिक जीवन का सत्यानाश तय है। 
  • दोनों ही परिस्थिति में धारा का आना तो तय है। 

निष्कर्ष: यीशु मसीह की आज्ञा पालन मानना हमारे आत्मिक जीवन की नींव है। चुनाव हमारे हाथ में है कि हमें किस तरह का घर बनाना है। हमें ऐसा घर बनाना चाहिए जो हर परिस्थिति में स्थिर बना रह सकता है उसकी बातें हमारे घर की नींव है जिनका पालन करना हमारे घर को मजबूती देता है। यीशु प्रभु है तो उसके प्रभुत्व को हृदय से स्वीकार भी करना है।

शालोम

Anand Vishwas
Anand Vishwas
आशा है कि यहां पर उपलब्ध संसाधन आपकी आत्मिक उन्नति के लिए सहायक उपकरण सिद्ध होंगे। आइए साथ में उस दौड़ को पूरा करें, जिसके लिए प्रभु ने हम सबको बुलाया है। प्रभु का आनंद हमारी ताकत है।

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