Whom Are You Bringing To Jesus? | लोगों को यीशु के पास लाने के लिए आपके जीवन में क्या खूबियाँ होना जरुरी है? | (Mark 2:1-12)

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Whom Are You Bringing To Jesus? आज आप किसे यीशु के पास ला रहे हैं? यदि हम सच में इस विषय के प्रति गंभीर हैं कि कैसे लोगों को मसीह के पास लाएं तो वचन इसके बारे में कई उदाहरण देता है कि हममें वो क्या-क्या खूबियां होनी चाहिए जिससे हम लोगों को प्रभु यीशु के पास ला सकते हैं। यह काम एक मसीही जन तभी करेगा जब वो धरती पर के अपने जीवन के उद्देश्य को जानता है और समझता है। प्रभु यीशु ने हमें मेलमिलाप की सेवा दी है। हमारा कार्य है कि हम परमेश्वर से दूर हुए लोगों का फिर से परमेश्वर के साथ मेलमिलाप करवाएं।

एक समय हम भी खोए हुए थे फिर किसी विश्वासयोग्य व्यक्ति ने हमें अपनी गवाही देकर और सुसमाचार सुनाकर प्रभु यीशु से मिलाया और जब हम इस सच्चाई को जान गए, हमने अपने पापों से पश्चाताप करके और यीशु को अपना उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार किया। इस तरह हमारे जीवन में हमारा मेलमिलाप सच्चे परमेश्वर से हो पाया। (2 कुरिन्थियों 5:18-20)

मेरे प्रियो, आज भी बहुत से लोग हैं जो सच्चे परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे आज भी खोए हुए हैं और भटक रहे हैं। वे आज भी शांतिरहित, सत्य रहित, आज़ादी रहित और उद्धार रहित हैं। आज जब कोई मसीही जन उस महान आदेश को पूरा करने के लिए जाता है तो आज इस कार्य में हम परमेश्वर के सहकर्मी हैं। (मती 28:18-20, 1 कुरिन्थियों 3:9)

आज इन विशेषताओं को हम मरकुस रचित सुसमाचार के दूसरे अध्याय से जानेंगे कि हमें किस प्रकार का व्यक्ति होना चाहिए। (मरकुस 2:1-12) ऐसा नहीं है कि हमारे जीवन में सिर्फ ये ही खूबियाँ होनी चाहिए, वचन के अन्य हिस्से और भी कई बातों के बारे में बताते हैं जो एक मसीही सेवक के जीवन में होने चाहिए। मरकुस के इस भाग से हम बहुत कुछ जान सकते हैं यीशु के व्यक्तित्व के बारे में, उनकी जीवन शैली के बारे में, लोगों के स्वभाव के बारे में, उनके विरोधियों के बारे में, उस लकवे के रोगी के बारे में कि किस प्रकार उसको चंगाई मिली।

पर आज हम उन चार व्यक्तियों के जीवन से भी कुछ सीख लेंगे, जिन्होंने उस लकवे के रोगी की चंगाई में या यूं कहें सच्चे परमेश्वर को जानने में मदद की। हालाँकि बाइबल बताती है कि लोगों ने इन चार लोगों से उन्हें उठवाकर लाया। (मरकुस 2:3) हम कहीं न कहीं ये कह सकते हैं कि दूसरों ने उस व्यक्ति की सहायता की, यीशु को जानने में। यीशु से मिलने के बाद ही उसे क्षमा प्राप्ति हुई और शारीरिक चंगाई भी। आज ऐसे बहुत से हैं जिन्हें यीशु से मिलने की आवश्यकता है।

यदि हम किसी को प्रभु यीशु के पास लाना चाहते हैं तो हममें जरूर कुछ विशेषताएं होनी चाहिए। यीशु के पास किसी को लाने के लिए हममें होना चाहिए…. तरस…

तरस वाले व्यक्ति बनें।

तरस वाले व्यक्ति बनें। (Mark 2:1) – इस बात को हम स्वयं प्रभु यीशु के चरित्र में देख सकते हैं कि उनका ह्रदय लोगों के प्रति तरस से भरा हुआ था। (मती 9:36) हम मरकुस 2 अध्याय में देखते हैं कि यदि इन चार जन में जिन्होंने उस लकवे के रोगी को खाट सहित उठा लाया, तरस न होता तो कभी भी उस रोगी को यीशु के पास पहुंचाने की कोशिश न करते। उनके ह्रदय में भी जरुर उस व्यक्ति के प्रति तरस रहा होगा तभी तो उन्होंने उसको यीशु के पास जल्द से जल्द पहुँचाने का प्रयास किया।

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अगर आप अपने जीवन में प्रभु के अनुग्रह को समझते हैं और उसके उद्धार की सामर्थ को जानते हैं तो आपका ह्रदय भी दूसरों के प्रति तरस से भरा हुआ होगा और उनको एकमात्र सच्चे सुसमाचार के बारे में बताने के लिए प्रयासरत रहेंगे और उस सुसमाचार से कभी शर्मिंदगी महसूस नहीं करेंगे।

स्थिर व्यक्ति बनें।

स्थिर व्यक्ति बनें। (Mark 2:2) – जिस प्रकार हम देखते हैं कि यीशु ने जैसे ही अपनी सेवा को शुरू किया उनका एक ही सन्देश था, “स्वर्ग का राज्य” और इसी विषय में वे अलग-अलग जगहों में सिखाते फिरे। उसी तरह हमें भी आज वो ही सन्देश पर स्थिर रहना है पर जैसा कि हम उन चार व्यक्तियों के बारे में सीख रहे हैं, उनमें भी स्थिरता थी। जब उन्होंने देखा जहाँ यीशु वचन सुना रहे हैं वहां तो दरवाजे पर भी जगह नहीं थी। हो सकता था कि वे निराश हो जाएं पर फिर भी वे स्थिर रहे और एक दूसरे का सहयोग किया।

सहयोग करने वाले बनें।

सहयोग करने वाले बनें। (Mark 2:3) – जैसा कि उन चार भाइयों में सहयोग की भावना को देख सकते हैं उन्होंने उस व्यक्ति को यीशु के पास लाने के लिए आपसी सहयोग किया। उन चारों ने खाट को उठाया। आज हम भी जो यीशु के ऊपर विश्वास करने वाले हैं, हमें भी एकजुट होकर खोये हुए व्यक्ति को यीशु के पास लाना है। ये एक टीमवर्क है जिसे हर एक सेवकाई को मिलकर करना है।

रचनात्मक बनें।

रचनात्मक बनें। (Mark 2:4) – जब उन चार व्यक्तियों ने देखा कि दरवाजे पर भी काफी भीड़ है, उन्होंने साथ मिलकर एक जोख़िम उठाने वाला काम भी किया। वे रचनात्मक व्यक्ति थे उन्होंने प्लान किया क्यों न घर की छत को खोलकर इस व्यक्ति को यीशु के पास पहुँचाया जाए! उन्होंने वैसा ही किया और सब उनके इस कारनामे से चकित भी हुए। शायद उन्होंने आपस में ये भी बात की होगी कि घर की छत को तो हम बाद में भी बुन लेंगे लेकिन अभी ये लकवे का रोगी स्वस्थ होना चाहिए।

जोख़िम उठाने वाले बने।

इन चार व्यक्तियों को तो उस लकवे के रोगी को यीशु के पास हर हालत में पहुँचाना था। उनको मालूम था कि यीशु ही उसे पहले जैसा स्वस्थ कर सकता है। इसलिए जब उन्होंने देखा कि भीड़ के करण हम दरवाजे से तो नहीं जा सकते हैं पर छत को तो उखाड़ कर इस व्यक्ति को यीशु के पास पहुंचा सकते हैं। उन्होंने वैसा ही किया। ये एक जोख़िम भरा काम था। शायद उन्होंने उसे हर हालत में यीशु के पास पहुँचाने की ठान ली थी। शायद उन्होंने ये भी योजना बनाई हो कि जैसे ही व्यक्ति ठीक हो जाएगा वैसे ही हम छत को फिर से मरम्मत भी कर देंगे।

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इस प्रकार का कार्य प्रभु ने हम सबको दिया है। हो सकता है कि आज आपको किसी व्यक्ति को यीशु के पास लाने के लिए छत न उखाड़ना पड़े पर फिर भी लोगों को यीशु से मुलाकात करवाने के लिए आपको जोख़िम तो आज भी उठाना होगा। वो इसलिए कि हम सुसमाचार की ताकत को जानते हैं जो हर एक विश्वास करने वालों के उद्धार के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य है। (रोमियों 1:16-17) आज कई ताकतें एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं कि किस प्रकार यीशु के प्रचार को रोका जाए पर यहाँ आपको रचनात्मक भी होना होगा और जोख़िम उठाने वाला भी बनना होगा। यीशु ने पहले ही कह दिया था कि मैं तुम्हें भेड़ों के समान भेड़ियों के बीच में भेज रहा हूँ। (मती 10:16)

विश्वास रखने वाले बनें।

आत्मविश्वासी बनें। (Mark 2:5) – इन चारों को अगर आत्मविश्वास न होता तो ये कभी भी उस व्यक्ति को यीशु के पास खाट समेत नहीं लाते। यही बात हमारे लिए भी है जब भी हम दूसरों को प्रभु यीशु के पास लायें तो हम आत्मविश्वास से भरे हुए होने चाहिए। विश्वास के बिना हम परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते हैं। (इब्रानियों 11:6) इसलिए जब भी हम इस कार्य में लगे हैं तो हमारा विश्वास कम न होने पाए। हम भले काम करने में साहस न छोड़ें, क्योंकि यदि हम ढीले न हों तो ठीक समय पर कटनी काटेंगे। (गलातियों 6:9) ये भी स्मरण रखें कि प्रभु में आपकी मेहनत बेकार नहीं है। ( 1 कुरिन्थियों 15:58)

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मुझे आशा है कि इस लेखांश से आपकी कुछ मदद जरुर हुई होगी। आज हमें वो क्रूस का सन्देश लोगों तक पहुँचाने कि जरुरत है जो उनका उद्धार करने की सामर्थ रखता है। इसके लिए हमारे जीवन को तरस से भरा होना आवश्यक है, हमें स्थिर होना जरुरी है, एक दूसरे का सहयोग करना है, रचनात्मक होना है, जोख़िम उठाने वाले बनना है और विश्वास से भरे हुए व्यक्ति बनना है।

आज आप किसको यीशु के पास ला रहे हैं? (Whom Are You Bringing To Jesus?)

शालोम

Anand Vishwas
Anand Vishwas
आशा है कि यहां पर उपलब्ध संसाधन आपकी आत्मिक उन्नति के लिए सहायक उपकरण सिद्ध होंगे। आइए साथ में उस दौड़ को पूरा करें, जिसके लिए प्रभु ने हम सबको बुलाया है। प्रभु का आनंद हमारी ताकत है।

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