How Do We Live a Spiritual Life? | आत्मिक जीवन क्या है? | आत्मिक जीवन कैसे जीयें?

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How Do We Live a Spiritual Life? सर्वप्रथम मुझे खुशी है कि आप अपने आत्मिक जीवन (Spiritual Life) में बढ़ना चाहते हैं, उसको जीना चाहते हैं। सच में इस प्रकार की सोच आना ये दर्शाता है कि आप अपने आत्मिक जीवन के बारे में गंभीर हैं। आत्मिक जीवन जीने के लिए आपको किसी भी धार्मिक प्रणाली से ऊपर उठना होगा क्योंकि जितनी भी विधियाँ आपको कोई धार्मिक प्रणाली बताएगी वे सभी मानव निर्मित हैं।

इसलिए यह उचित रहेगा कि जिसने मानव की रचना की, उसके पास आयें ताकि आपको अपने जीवन के लिए इन महत्वपूर्ण जानकारियों का अभाव न रहे। आपको पवित्रशास्त्र बाइबल जो कि पवित्रात्मा की प्रेरणा से रचा गया है उसको अध्ययन करने की आवश्यकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि बिना परमेश्वर के हम अपने आत्मिक जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। मालूम है क्यों? क्योंकि परमेश्वर आत्मा है और हमें भी उसने अपने समानता व स्वरूप में बनाया है। 

लोग आत्मिक जीवन क्यों जीना चाहते हैं? क्योंकि लोग इस भौतिक जीवन से उब गए हैं। उन्हें भी मालूम है कि इससे बेहतर जीवन अस्तित्व में है। इसलिए वे आत्मिक जीवन की खोज में हैं, कुछ लोगों को अभी तक इसका रास्ता भी नहीं मिला क्योंकि वे अपनी बुद्धि और सामर्थ से इसको ढूंढना चाह रहे हैं। 

लेकिन प्रभु यीशु का धन्यवाद हो कि उन्होंने पवित्रशास्त्र में हमें आत्मिक जीवन जीने की भरपूर विधियां बताई हुई हैं क्योंकि वो हमसे पहले चाहते है कि हम आत्मिक जीवन जीएं। उन्होंने खुद भी आत्मिक जीवन जीकर हमें एक आदर्श दिया है, और हमें इसलिए बुलाया भी गया है कि हम उसके पदचिन्हों पर चलें। (1 पतरस 2:21) 

मेरे प्रियो, यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी। (गलातियों 5:25) आत्मिक जीवन एक परिपक्वता में बढ़ने वाला जीवन होता है। आइए पवित्रशास्त्र में से कुछ विधियों को जानें कि कैसे हम आत्मिक जीवन जी सकते हैं। 

यह एक भक्ति का जीवन है।

आत्मिक जीवन (Spiritual Life) एक भक्ति का जीवन है। परमेश्वर का वह अनुग्रह हमें चेतावनी देता है जो हमारे उद्धार कारण है कि हम अभक्ती और सांसारिक अभिलाषाओं से मन फेर कर इस युग में संयम, धार्मिकता और भक्ति से जीवन बिताएं। (तीतुस 2:12) परमेश्वर चाहते हैं कि पाप हमारे नश्वर शरीर में राज न करे और ना हम उसकी लालसाओं के अधीनता में रहें, न हम अपने अंगों को अधर्म के हथियार होने के लिए पाप को सौंपे पर परमेश्वर चाहते हैं कि हम अपने अंगों को धार्मिकता का हथियार होने के लिए उन्हें परमेश्वर को सौंपे और एक भक्तिपूर्ण जीवन जीयें। (रोमियों 6:13) 

आज भले ही मनुष्य ने हर प्रकार के वन पशु, पक्षी, रेंगनेवाले जंतु और जलचर नियंत्रण कर लिए हों पर अभी भी वो अपने आपको नियंत्रित करने में नाकाम ही रहा है। वचन कहता है कि यदि हम अपने आपको भक्त समझे और अपनी जीभ को लगाम न दे, बल्कि अपने ह्रदय धोखा दे तो उसकी भक्ति व्यर्थ है। (याकूब 1:26) परमेश्वर की भक्ति ही हमें आत्मिक जीवन जीना सिखाती है।

आत्मिक भोजन से जीवित रहने वाला जीवन।

आत्मिक जीवन (Spiritual Life) आत्मिक भोजन से जीवित रहने वाला जीवन है। जिस प्रकार से हमारे भौतिक शरीर को भोजन की आवश्यकता होती है उसी प्रकार हमारी आत्मा के लिए आत्मिक भोजन की आवश्यकता होती है। इसलिए प्रभु यीशु कहते हैं कि नाशवान भोजन के लिए परिश्रम न करो पर उस भोजन के लिए परिश्रम करो जो अनंत जीवन तक ठहरता है। (यूहन्ना 6:27) 

आगे यीशु कहते हैं कि जीवन की रोटी वो स्वयं ही है जो कोई उनके पास आता है, वो कभी भूखा ना रहेगा और जो कोई उस पर विश्वास करता है, वो कभी प्यासा ना होगा। (यूहन्ना 6:35) स्मरण रखें कि मनुष्य केवल रोटी से ही नहीं पर हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख निकलता है जीवित रहता है। (मती 4:4) 

How Do We Live a Spiritual Life?

उसके वचन के बिना जीवन की कल्पना करने का कोई औचित्य नहीं बनता। उसके वचन में जीवन है। आपको मालूम ही है जब परमेश्वर ने सृष्टि की रचना की तो अपने वचन के द्वारा ही की। यूहन्ना बताता है कि इसी वचन ने देहधारी होकर हम मनुष्यों के साथ वास भी किया पर कई मनुष्यों ने उसको पहचाना ही नहीं। (यूहन्ना 1:1-12) यीशु ही जीवन का सोता है उसके बिना आत्मिक जीवन (Spiritual Life) की कल्पना करना संभव नहीं। 

एक आज्ञाकारी जीवन।

जैसा कि हमने बात किया था कि उसके बिना हम आत्मिक जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते यदि ऐसा है तो उसकी इच्छा को जानना और उसके अनुसार जीना भी महत्वपूर्ण है, अन्यथा हमारा उसको प्रभु कहना भी व्यर्थ है। क्योंकि यदि हम अपने मुंह से उसको अपना स्वामी कह रहे हैं तो उसका मानना भी जरूरी है। (मती 7:21) क्योंकि हमने पहले ही देख लिया था कि आज्ञाकारिता महत्वपूर्ण है उसका कोई विकल्प मौजूद नहीं है। (लूका 6:46-49) 

आज्ञाकारिता का पाठ हम स्वयं प्रभु यीशु से भी सीख सकते हैं वो भी प्राण देने तक आज्ञाकारी रहा। (यूहन्ना 15:10, फिलिप्पियों 2:8) यदि हम भी आत्मिक जीवन जीना चाहते हैं तो हमें आज्ञाकारी भी होना पड़ेगा। आज्ञाकारिता का पाठ हम यहोशू से भी सीख सकते हैं, जो जो आज्ञाएं उसको मूसा के द्वारा मिली थी उसमें से उसने बिना पूरी किए कोई भी आज्ञा ना छोड़ी। (यहोशू 11:15) 

नूह भी आज्ञाकारी व्यक्ति था क्योंकि जो भी आज्ञा उसको परमेश्वर से मिली उसने उसी के अनुसार किया। (उत्पति 6:22) बाइबल आज्ञाकारी लोगों से भरी पड़ी है पर इस लेख में उन सब के बारे में बात करना संभव नहीं। आज्ञाकारिता किसी बलिदान से ज्यादा परमेश्वर को भाती है। (1 शमूएल 15:22) हमें अनाज्ञाकारिता के द्वारा उसको शोकित नहीं करना है। इसलिए हम भी आज्ञाकारी हों और अपने आत्मिक जीवन में उन्नति करते रहें।

एक विश्वास का जीवन।

आत्मिक जीवन (Spiritual Life) एक विश्वास का जीवन है। क्योंकि परमेश्वर को हम विश्वास के बिना प्रसन्न नहीं कर सकते हैं, जो भी परमेश्वर के पास आता है उसे यह विश्वास करने की जरूरत है कि वो विद्यमान है और अपने खोजने वालों को प्रतिफल भी देता है। (इब्रानियों 11:6) 

पौलुस बताते हैं कि हम ऐसे लोग हैं जो रूप देखकर नहीं पर विश्वास से चलते हैं। (2 कुरिन्थियों 5:7) अभी तो हमें धुंधला दिखाई देता है पर एक समय आएगा जब हम उसको आमने सामने देखेंगे। (1 कुरिन्थियों 13:12) विश्वास स्थाई है। जब हम परमेश्वर से कुछ मांगें तो वो भी विश्वास से मांगें, हम संदेह ना करें अन्यथा हमें कुछ भी नहीं मिलेगा। (याकूब 1:6) अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया इसलिए यह उसके लिए धार्मिकता गिनी गई। नूह ने परमेश्वर पर विश्वास किया तभी तो लोगों के ताने सुनने के बावजूद भी वो निरन्तर जहाज बनाने में लगा रहा और लोगों को धार्मिकता का प्रचार करता रहा। 

कभी भी अपने जीवन में संदेह को आने ना दें और यदि कभी आए तो आप उस व्यक्ति की तरह प्रभु से विनती कर सकते हैं जिसने कहा कि प्रभु मैं विश्वास तो करता हूं तो भी मेरे अविश्वास का उपाय कर। (मरकुस 9:23-24) हां जब हम इस अविश्वास भरी दुनियां में रहते हैं तो परमेश्वर पर विश्वास करना कठिन लगता है, पर हम परमेश्वर को विश्वास के बिना प्रसन्न नहीं कर सकते, विश्वास के बिना हम उद्धार भी नहीं पा सकते। इसलिए परमेश्वर के वचन में हम कई विश्वास के नायकों को पाते हैं जिन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में भी अपना विश्वास कायम रखा, क्योंकि वे भी समझते थे कि हम विश्वास के बिना आत्मिक जीवन नहीं जी सकते।

एक गवाही का जीवन। 

आत्मिक जीवन (Spiritual Life) एक गवाही का भी जीवन है। क्योंकि परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि हम उसके गवाह हैं। परमेश्वर ने आज तक हमारे जीवन में बहुत से कार्य किए हैं उन कार्यों को दूसरों को बताना गवाही देना कहलाता है। उदाहरण के लिए हम ने विश्वास कैसे किया, क्यों किया इत्यादि। 

यीशु ने अपने शिष्यों को बताया कि तुम पृथ्वी के छोर तक मेरे गवाह होंगे। (प्रेरितों 1:8) प्रेरितों की पुस्तक जो कि आज तक समाप्त नहीं हुई है विश्वासी और प्रभु के शिष्य, हम सब उसके गवाह हैं। (प्रेरितों 3:15, 5:32) पवित्र आत्मा जो कि हमारा सहायक है वो गवाही देता है तभी तो आज तक परमेश्वर का वचन जो हमारे पास पहुंचा है पवित्र आत्मा की प्रेरणा से रचा गया और हम तक पहुंचाया गया ताकि हम भी गवाही दें। (यूहन्ना 15:26-27) हम भी इसलिए मनफिराव का प्रचार करते हैं क्योंकि हम उसके गवाह हैं। (यूहन्ना 24:48) 

हम किस बात के गवाह हैं? आज तक परमेश्वर ने हमारे जीवन में जो भी कार्य किए हम उसके गवाह हैं। गवाह की जिम्मेदारी है कि बिना किसी डर के जो कुछ भी देखा है उसको प्रकट करे। (प्रेरितों 26:16)

एक खुद इंकारी का जीवन।

आत्मिक जीवन (Spiritual Life) एक खुद इंकारी का जीवन होता है। यह प्रभु को प्राथमिकता देने का जीवन होता है। यह जीवन बलिदान की मांग करता है। यदि हम खुद इंकारी के जीवन जीने में चूक जाते हैं तो हम इस योग्यता को खो देते हैं। (मती 10:37-39) वैसे भी इब्रानियों के लेखक के अनुसार हमें गवाहों के बादल ने घेरा है अर्थात् हमारे सामने इतने साक्षी हैं जिन्होंने एक खुद इंकारी का जीवन जीया। इन्होंने अपनी दौड़ को पूरा किया और हर एक उलझाने वाली और रोकने वाली बातों को अपने जीवन से दूर किया। (इब्रानियों 12:1) क्योंकि ये जानते थे कि दौड़ में दौड़ते तो सभी हैं पर इनाम एक ही ले जाता है।

हमें भी परमेश्वर का वचन प्रोत्साहित करता है कि हम भी ऐसे ही जीवन को जीएं। क्योंकि पहलवान भी मुरझाने वाले अर्थात् नाश होने वाले मुकुट को पाने के लिए आत्मसंयम करता है, कई अनावश्यक चीज़ों में अपने आप को नहीं फंसाता है अर्थात् जब वो नश्वर मुकुट पाने के लिए अपने आपको अनुशासित करता है तो मेरे प्रियो, हमें भी अपने आत्मिक जीवन को अनुशासित करने की आवश्यकता क्यों न होगी?

पौलुस कहते हैं कि हम लक्ष्यहीन नहीं हैं। (1 कुरिन्थियों 9:24-27) प्रभु ने हमें इसलिए बुलाया भी है कि हम सिद्धता की इस दौड़ को दौड़ते रहें। (फिलिप्पियों 3:12-19) यह काम हमारी सामर्थ से मुश्किल जरूर हो सकता है पर इस बात को भी याद रखें कि जो हमें सामर्थ्य देता है उससे हम यह कर सकते हैं। (फिलिप्पियों 4:12-13)

एक सावधानी का जीवन।

आत्मिक जीवन (Spiritual Life) एक सावधानी का जीवन भी है जिसने हमें हर समय हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना और विनती करने की आवश्यकता है। इसमें लापरवाही हमें हमारे आत्मिक जीवन को जोखिम में डाल देगी। हमें न सिर्फ अपने लिए सावधानी से जागते रहने और प्रार्थना करने की आवश्यकता है बल्कि दूसरे मसीहियों को भी इसके लिए तैयार करना है। (इफिसियों 6:18)

वचन हमें यही प्रोत्साहित करता है कि हम जागते रहें और प्रार्थना करते रहें कि हम किसी प्रलोभन में न पड़ें। क्योंकि इस कार्य के लिए आत्मा तो तैयार है पर हमारा शरीर कमजोर है तभी प्रभु यीशु ने हमें उत्साहित किया कि हम लापरवाह न रहें बल्कि सावधान रहें और प्रार्थना करते रहें। क्योंकि आत्मिक जीवन लापरवाही का जीवन नहीं है बल्कि सावधान रहने का जीवन है। (मती 26:41, मरकुस 13:33, 37) हम जागते रहें, विश्वास में स्थिर रहें। मजबूत बने रहें। (कुरिन्थियों 16:13)

क्योंकि धन्य हैं वे दास जिन्हें स्वामी आकर जागते पाएं। (लूका 12:37) हम दूसरों के समान लापरवाह न रहें बल्कि जागते और सावधान रहें। (1 थिस्सलुनीकियों 5:6) हम इस दुनियां में अपना जीवन खुमारी में, मतवालेपन और इस जीवन की चिंताओं में सुस्त न कर दें। इस बात को भी स्मरण रखें कि यीशु का दूसरा आगमन नजदीक हैं और हम ऐसे सावधानी पूर्वक जीवन जीएं कि हम उसके सामने खड़े रहने योग्य हों। (लूका 21:34-36) वो व्यक्ति धन्य है जो सावधान रहता है और अपनी चौकसी करता रहता है। (प्रकाशितवाक्य 16:15)

एक प्रार्थना का जीवन।

आत्मिक जीवन एक प्रार्थना वाला जीवन है। यह जीवन प्रार्थना के बिना जीवित नहीं रह सकता है। हमारी प्रार्थना में वो मूल्य अवश्य हों जो प्रभु यीशु ने हमें सिखाए हैं। (मती 6:6-15) हमारे लिए यही आज्ञा है कि हम निरन्तर प्रार्थना करते रहें। (1 थिस्सलुनीकियों 5:17) जैसा कि हमने पहले भी देखा है कि हमें जागते रहने और प्रार्थना करने की आवश्यकता है ताकि हम किसी परीक्षा में भी न पड़ें। (मती 26:41)

How Do We Live a Spiritual Life?
Prayer Photo by Patrick Fore on Unsplash

हम भी प्रभु से निरन्तर प्रार्थना कर सकते हैं। (प्रेरितों 10:2, इफिसियों 6:18) हम प्रभु का धन्यवाद देते हैं जिसने हमें ये मौका दिया है कि हम उसे पिता कह सकते हैं। (रोमियों 8:15) बहुत बार हमें नहीं मालूम कि कैसे प्रार्थना कि जाए पर प्रभु का आत्मा हमारी दुर्बलता में हमारा सहायक है जो आहें भर-भर कर जो ब्यान से बाहर है हमारे लिए विनती करता है। हमारे मन को जानने वाला जानता है कि आत्मा की मनसा क्या है। (रोमियों 8:26-27)

पौलुस को हम कई जगह पाते हैं कि वह विश्वासियों की आत्मिक उन्नति के लिए निरंतर प्रार्थना करता था। हम भी ऐसी प्रार्थनाएं अपनी आत्मिक उन्नति के लिए कर सकते हैं। उदाहरण के लिए पौलुस की प्रार्थनाएं देखें और अपने लिए भी ऐसे ही प्रार्थनाएं करते रहें। (इफिसियों 1:15-22, 3:16-21, फिलिप्पियों 1:9-11, कुलुस्सियों 1:9-14) हम प्रार्थना करते रहें क्योंकि आत्मिक जीवन एक प्रार्थना वाला जीवन भी है।

एक उन्नति का जीवन।

आत्मिक जीवन (Spiritual Life) निरन्तर उन्नति का जीवन है। हमें निरंतर उन्नति करते जाना है। जिस प्रकार एक बालक को निश्चित अवधि तक दूध की आवश्यकता होती है पर धीरे-धीरे वो बालक बड़ा होता जाता है और उसे अब अन्न की आवश्यकता भी होती है। हमें भी अपने आत्मिक जीवन में निरन्तर उन्नति करते जाना है अर्थात् हमें आत्मिक परिपक्वता की ओर बढ़ते जाना है। (1 कुरिन्थियों 3:1-2)

मसीही शिक्षा में अब हमें बालक नहीं बने रहना है जो कि आसानी से मनुष्यों की ठग विद्या और चतुराई का शिकार होते हैं। (इफिसियों 4:14) बहुत से मसीही अपने आत्मिक जीवन में कोई उन्नति करते हुए दिखाई नहीं देते हैं तभी पौलुस कहता है कि समय के विचार से तो तुम्हें अब शिक्षक हो जाना चाहिए पर ऐसा लगता है कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचन की आदि शिक्षा फिर से सिखाए। पौलुस कहता है कि अब तो आपमें परिपक्वता आनी ही चाहिए। (इब्रानियों 5:12)

क्योंकि धर्मी लोग तो निरन्तर अपने आत्मिक जीवन में उन्नति करते जाते हैं, वचन बताता है कि वे तो खजूर के समान फले फूलेंगे। (भजन संहिता 92:12) आत्मिक व्यक्ति उतरोतर उन्नति करता जाता है। (नीतिवचन 4:18) इसलिए यदि हम अपने जीवन की हर बात में चौकसी रखेंगे तो हम न सिर्फ अपनी बल्कि दूसरों की उन्नति का कारण भी होंगे। (1 तीमुथियुस 4:16)

एक बहुतायत का जीवन।

एक आत्मिक जीवन (Spiritual Life) बहुतायत का जीवन होता है जिसका वायदा स्वयं प्रभु यीशु अपने अनुयायियों से करते हैं। वो इसलिए आए हैं कि हम बहुतायत अर्थात् भरपूरी का जीवन जीएं। (यूहन्ना 10:10) क्योंकि जीवन का सोता प्रभु के ही पास है, उसके प्रकाश के द्वारा ही हम प्रकाश पाते हैं। (भजन संहिता 36:9) वो ही हमें सब प्रकार अनुग्रह बहुतायत से देता है और यह अनुग्रह हमें भी हर बात में, हर समय सब कुछ जिसकी हमें आवश्यकता है प्रदान करता है ताकि हर एक भले कामों के लिए हमारे पास भी बहुतायत से हो। (2 कुरिन्थियों 9:8)

याद रखें परमेश्वर ऐसा सामर्थी है जो हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम करता है। (इफिसियों 3:20) क्योंकि वो ऐसा परमेश्वर है अपने उस धन के अनुसार जो मसीह में है आपकी हर एक घटी को पूरी करेगा। (फिलिप्पियों 4:19) अब जब कि हमारा परमेश्वर बहुतायत अर्थात् भरपूरी से अपने अनुग्रह का दाता है तो हम भी अपने आत्मिक जीवन में उस भरपूरी का आनंद लें जिसका उसने वादा किया है।

एक परमेश्वर को सौंपने का जीवन।

एक आत्मिक जीवन (Spiritual Life) अपना सर्वस्व परमेश्वर को सौंपने का जीवन है। हमें अपने अंगों को अधर्म का हथियार होने के लिए पाप को नहीं सौंपना है बल्कि अपने अंगों को धार्मिकता का हथियार होने के लिए परमेश्वर को सौंपना है। अर्थात् पाप हमारे नश्वर शरीर में राज्य न करने पाए, हम अपना जीवन शारीरिक लालसाओं में व्यतीत न करें बल्कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करें। (रोमियों 6:11, 13)

जो भी मसीह के हैं उन्होंने अपने शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है। (गलातियों 5:24) क्योंकि अब हमारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है। (कुलुस्सियों 3:3) हमारा पुराना मनुष्यत्व तो मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ा दिया है ताकि हमारा पाप का शरीर व्यर्थ हो जाए और आगे को हम पाप की गुलामी में न रहें। (रोमियों 6:6) अतः जब परमेश्वर ने हमसे प्रेम किया तो हमारा भी कर्तव्य है कि हम अपने जीवन को उसके हाथ में सौंप दें और उसकी इच्छा के अनुसार जीवन व्यतीत करें।

मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं, अब मैं जीवित न रहा पर मसीह मुझ में जीवित है और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो उस विश्वास से जीवित हूं जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझसे प्रेम किया और मेरे लिए अपने आप को दे दिया। – गलातियों 2:20

एक आत्मिक लड़ाई का जीवन।

मसीही जीवन अर्थात् एक आत्मिक जीवन (Spiritual Life) एक आत्मिक लड़ाई का जीवन है। वचन हमें याद दिलाता है कि हम एक युद्ध में हैं जो कि एक आत्मिक युद्ध है। क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध लहू और मांस से नहीं अर्थात् किसी शारीरिक शत्रु से नहीं बल्कि एक आत्मिक जगत में रहने वाले प्रधानों से, आधिकारियों से और इस संसार के अंधकार के हाकिमों से और दुष्टता की आत्मिक सेना से है जो आकाश में है। (इफिसियों 6:12)

और जब कि युद्ध आत्मिक है तो जाहिर सी बात है कि इस युद्ध के हथियार भी आत्मिक होंगे। ये लड़ाई के हथियार बेशक शारीरिक नहीं पर ये हथियार गढ़ों को ढा देने के लिए परमेश्वर द्वारा सामर्थी हैं। (2 कुरिन्थियों 10:4) यदि हम याद करें कि परमेश्वर का वचन भी एक आत्मिक हथियार है तो आपको याद होगा कि किस प्रकार प्रभु यीशु ने इसका इस्तेमाल कर शैतान को हरा दिया। (इब्रानियों 4:12)

इस युद्ध में विजयी होने के लिए और भी आत्मिक हथियार हैं जिनके बारे में हम आने वाले समय में बात करेंगे। पर अभी के लिए ये स्मरण रखें कि हम एक आत्मिक युद्ध में हैं ये लापरवाही का जीवन तो बिल्कुल भी नहीं होगा। आत्मिक जीवन एक आत्मिक युद्ध का जीवन है।

एक जय पाने वाला जीवन।

आत्मिक जीवन (Spiritual Life) एक जयवंत जीवन है, जिसके लिए हमें बुलाया गया है। हमें विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़नी है और अनंत जीवन को ग्रहण कर लेना है। (1 तीमुथियुस 6:12) हमें यह बात स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जिसने हमें बुलाया है हमें उसको प्रसन्न करने वाला जीवन जीना है और अपने आपको संसार के कामों में नहीं फंसाना है। (2 तीमुथियुस 2:4) क्योंकि जिस युद्ध को हमें लड़ना है वो पहले से ही जीता जा चुका है। यह युद्ध हमारा नहीं है बल्कि परमेश्वर का है। (निर्गमन 14:14) जिसके साथ हमारा यह युद्ध है उसको मालूम है कि उसका थोड़ा सा समय बाकी रह गया है। (प्रकाशितवाक्य 12:11)

आत्मिक जीवन जीना एक यात्रा है। इसमें हम यहाँ पर जीते हुए पूरी तरह से सिद्ध तो नहीं होंगे पर ये सिद्धता में बढ़ने की प्रक्रिया जरुर है। खुशखबरी ये है कि आप जीवन के संघर्षों में अकेले नहीं है। प्रभु आपके साथ है और आपकी अगुवाई भी करेगा।

शालोम

Anand Vishwas
Anand Vishwas
आशा है कि यहां पर उपलब्ध संसाधन आपकी आत्मिक उन्नति के लिए सहायक उपकरण सिद्ध होंगे। आइए साथ में उस दौड़ को पूरा करें, जिसके लिए प्रभु ने हम सबको बुलाया है। प्रभु का आनंद हमारी ताकत है।

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