Abiding In Christ | मसीह में बने रहने का क्या अर्थ है? | जाने इसका क्या परिणाम होगा? | John 15:1-8

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Abiding In Christ. (John 15:1-8) आपने दाखलता और डालियों का दृष्टांत तो कई बार पढ़ा होगा, पर क्या आपने जानने की कोशिश की कि क्यों मसीह ने इस दृष्टांत का उपयोग किया? मैं क्यों ये कह रहा हूं? आज के समय विश्वासियों का जीवन देखकर!

प्रभु यीशु के हर एक दृष्टांत में स्वर्गीय राज्य के भेद होते थे। बहुत बार उनके शिष्य भी उनको समझ नहीं पाते थे। वास्तव में उन्होंने इस दृष्टांत का प्रयोग ये समझाने के लिए किया कि हम उनके साथ एक संबंध में जुड़े हुए हैं और यदि हम उससे अलग होने का चुनाव करे तो हम कदापि फलवंत नहीं हो सकते। (यूहन्ना 15:4-5)

फलवंतता के लिए डाली का दाखलता में बने रहना (Abiding) अतिआवश्यक है। शिष्य भी समझ गए थे कि यदि डाली दाखलता से किसी भी वजह अलग होती है तो वह फलवंत नहीं रह सकती। वे डालियां जो टूट जाती हैं या कट जाती हैं वे निष्फल हो जाती हैं। (यूहन्ना 15:6)

ये बात तो पक्की है कि डालियों और लोगों में महत्त्वपूर्ण अंतर होता है। क्योंकि डालियों में चुनाव करने की क्षमता नहीं होती है। किसी लता की डालियां, लता से सिर्फ तभी अलग हो सकती है जब या तो उन्हें तोड़ दिया जाए या फिर काट लिया जाए या तो किसी कारण सूख जाए। जाहिर सी बात है कि निर्जीव प्राणी यह चुनाव नहीं कर सकते कि किसके साथ जुड़े रहें लेकिन लोग यह चुनाव कर सकते हैं। 

उससे जुड़े रहें।

लोगों के पास अपने आपको मसीह से दूर करने के बहुत से तरीक़े हैं। जैसे कि उसका आज्ञापालन न करने का चुनाव, उसके साथ बातचीत न करने का चुनाव, उस चीज को अच्छा समझने का चुनाव जो परमेश्वर की दृष्टि में अच्छी नहीं है या फिर ऐसे संबंधों का चुनाव जो उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाते हैं। ये कुछ ऐसे तरीके हैं जिनका प्रयोग करके मानवीय डालियां मुरझाने का चुनाव कर सकती हैं। प्रभु यीशु ने इस खतरे को भांपा और इसलिए उसने डाली को दाखलता के साथ जुड़े रहने (Abiding In Christ) की जरूरत को इतने स्पष्ट रीति से बताया।

यह विचार अटपटा लग सकता है कि कोई मसीही व्यक्ति मसीह के साथ पूरी रीति से जुड़े न रहने का चुनाव कर सकता है। जबकि प्रभु उसका स्त्रोत है तो उससे अलग रहने का तो सवाल ही नहीं उठता है। लेकिन जो प्रभु ने कहा वो आज हम अपने आस पास देखते हैं कि सभी मसीही लोग उस संबंध का आंनद नहीं उठाते हैं। इसका ये मतलब नहीं है कि वे मसीही नहीं हैं परन्तु इसका मतलब यह अवश्य है कि जब तक वे अपने आपको प्रभु से दूर रखेंगे तब तक उनका जीवन आत्मिक रीति से निष्फल होगा। क्योंकि जब उसके साथ जुड़े ही नहीं हैं तो फल कहां से आएगा?

लूका 15 अध्याय में प्रभु यीशु ने एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताया जिसके दो पुत्र थे और जिसमें से छोटा पुत्र पिता से अपना हिस्सा लेकर अपने पिता से दूर जाना चाहता है। हालांकि ये कहानी यीशु ने फरिसियों के लिए बताई थी परन्तु यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति का एक अच्छा उदाहरण है जिसने कुछ समय के लिए दाखलता से अलग होने का चुनाव किया। (लूका 15:11-32)

हम देख सकते हैं कि छोटा बेटा काफी समय के लिए पिता से दूर रहा फिर भी वह उसका बेटा ही था। पिता उसका इंतजार करता रहता कि पिता पुत्र का संबंध दुबारा स्थापित हो जाए। वह नौजवान बेशक दूर देश गया था और वहां उसके बारे में कोई नहीं जानता होगा, पर फिर भी उसके इस व्यवहार के कारण उसके रगों में बहने वाला खून नहीं बदला था। इसलिए जब उसे अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो फिर से उस संबंध में जुड़ने के लिए वापिस अपने पिता के पास आया। पिता भी उसके इंतजार में था, पिता बड़ा खुश हुआ जब उसका खोया हुआ पुत्र उसके पास लौट आया। 

हालांकि ये प्रभु यीशु ने पिता परमेश्वर और हमारे संबंध को दर्शाने के लिए ये दृष्टांत दिया। ऐसे ही जब हम भी वापिस पिता के पास लौट आते हैं तो पिता परमेश्वर हमारा खुशी से स्वागत करता है। परन्तु यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कई लोग उस बड़े बेटे की तरह उसके नजदीक होते हुए भी उस संबंध का आंनद नहीं उठाते। जो कि आज कई मसिहियों की ऐसी ही दशा है।

प्रभुता स्वीकार करना।

मसीह में बने रहने का अर्थ यह है कि व्यक्ति के जीवन में लगातार यह दिखाई दे कि वह व्यक्ति निरन्तर यीशु मसीह की प्रभुता के अधीनता में बना हुआ है। बहुत बार तो हम बिना सोचे समझे उसे प्रभु पुकारते हैं। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि वास्तव में इस पदवी का अर्थ क्या है?

जब एक व्यक्ति मसीह के पास आता है और उद्धार के उपहार को स्वीकार करता है तो उस नए विश्वासी को यह अहसास हो जाता है कि यीशु मसीह प्रभु है। इस प्रकार वो उसकी प्रभुता को स्वीकार करता है। (रोमियो 10:9) परन्तु जैसे ही वह विश्वासी प्रभु के साथ संबंध का अनुभव करने लगता है तो कई बार यीशु के प्रभु होने के व्यावहारिक प्रभावों के प्रति लापरवाह हो जाता है।

हां, प्रभु यीशु ने अपने अनुयायियों को मित्र कहा, पर इसका मतलब यह नहीं है कि अब वो प्रभु नहीं है। वचन बताता है कि वह युगानुयुग एक सा है। उसका हमें मित्र कहना उसकी प्रभुता को कम नहीं करता है। धन्यवाद हो प्रभु का, जो कि हमारा उद्धारकर्ता भी है और मित्र भी। 

आज्ञाकारिता।

बहुत बार हम उसकी प्रभुता के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। यीशु ने इस समस्या को पहचाना और कहा कि तुम मुझे प्रभु-प्रभु पुकारते हो और जो मैं कहता हूं वो नहीं करते? (लूका 6:46) यीशु उसकी बात को पालन करने वाले की तुलना बुद्धिमान घर बनाने वाले से करते हैं। जो कि सुरक्षित नीव पर घर बनाता है। पर साथ ही साथ उन लोगों के लिए भी चेतावनी है जो प्रभु को प्रभु पुकारते तो हैं पर उसके अनुसार नहीं जीते। इसलिए जब आंधी आयेगी तो वह घर विनाश हो जाएगा। क्योंकि आज्ञाकारिता वैकल्पिक नहीं है यह आवश्यक है। 

यीशु ही प्रभु है इस तथ्य को मानते हुए आज्ञापालन करना एक विश्वासी के जीवन में निरन्तर बना रहने वाला मसला है। क्योंकि हमने मसीही जीवन की यात्रा इस अंगीकार के साथ ही शुरू की थी कि यीशु ही प्रभु है। (रोमियो 10:9) यदि आगे चलकर विश्वासी अनाज्ञाकारी हो तो वास्तव में वह कहता है कि उसके विशेष निर्णय पर यीशु की कोई प्रभुता नहीं है। वचन हमें बताता है कि जिस प्रकार हमने उसे प्रभु के रूप में स्वीकार किया है हम उसी में जीवन बिताते रहें। (कुलुस्सियों 2:6) इस संबंध के जारी रहते हुए यीशु बदलता नहीं है। वह अभी भी हमसे निस्वार्थ प्रेम करता है। वह अभी भी हमारे संबंध का आदर करता है।

प्राथमिकता देना।

यदि एक मसीही यीशु को निरन्तर प्रभु मानता है तो वह अपने सारे कामों में मसीह को शामिल करेगा, उसको प्राथमिकता में रखेगा। उसे प्रभु पुकारना मात्र एक उपाधि से बढ़कर होना चाहिए। यह एक संबंध का प्रतिबिंब है।

अंत में तो यीशु मसीह को प्रभु के रूप में स्वीकार किया ही जाएगा। (फिलिप्पियों 2:9-11) एक समय आएगा कि हर घुटना उसके सामने झुकेगा और हर जीभ ये अंगीकार करेगी कि यीशु ही प्रभु है। अच्छी खबर यह है कि हम जो विश्वासी है, उन्हें इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है। हम प्रतिदिन अपने जीवन के द्वारा और अपने चुनावों के द्वारा इस सत्य को प्रकट कर सकते हैं कि यीशु मसीह हमारे जीवन का प्रभु है।

उसका सहयोग करें।

उस में बने रहें, क्योंकि उसके बिना हम फल नहीं ला सकते ना ही हम पिता को महिमा दे सकते हैं, इस प्रकार हम उसके शिष्य कहलाने के लायक भी नहीं रहते। (यूहन्ना 15:8) पर इस दृष्टांत में यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जो उसमें बने रहेंगे उनकी भी Pruning अर्थात् छंटाई होगी। ये बात जो बागवान हैं, अच्छी तरह से जानते हैं कि Pruning का भी एक समय होता है। ये वो सुधार कार्य है जब प्रभु हमारे जीवन को अनुशासित करता है और अवांछनीय चीज़ों को हमारे जीवन से अलग करता है। यह भी तभी संभव है यदि हम उसमें बने रहें, और इस कार्य में उसका सहयोग करें।

सारांश।

बहुत बार जब हम प्रार्थना करते हैं कि प्रभु मेरे जीवन में आत्मिक फल का विकास हो, मेरे जीवन में प्रेम, आनंद, शांति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता और संयम पैदा हो। अच्छी बात है कि हम ऐसी चाह रख रहे हैं पर जब तक हम उसके साथ जुड़े नहीं रहेंगे तो फल की कल्पना करना सम्भव नहीं। 

क्योंकि फल परिणाम है प्रतिदिन के संबंध का, जिसके लिए हमें बनाया गया था। फल एक प्रक्रिया के बाद ही आते हैं जिसके लिए कोई दूसरा विकल्प या शॉर्टकट है ही नहीं। मसीह में बने रहना (Abiding In Christ) न सिर्फ आपके जीवन को प्रभावित करता है बल्कि यह आपके परिवार, पड़ोस, समाज बल्कि हमारी अनंतजीवन की यात्रा को भी प्रभावित करता है।

अपने आप से पूछें

  • क्या मैं प्रतिदिन प्रभु के साथ अपने संबंध का आनंद ले रहा/रही हूं?
  • क्या मैं प्रतिदिन उसकी संगति में रहता/रहती हूं?
  • क्या मैं उसकी प्रभुता अपने जीवन के हर एक क्षेत्र में स्वीकार करता/करती हूं?
  • क्या मैं Prunning के लिए अर्थात् सुधार कार्य के लिए तैयार हूं?
  • क्या मैं फल ला रहा/रही हूं?
  • क्या सचमुच मैं उसका शिष्य कहलाने के योग्य हूं?
  • क्या मेरे जीवन के द्वारा प्रभु को महिमा मिल रही है?

थोड़ा समय इन प्रश्नों को अपने आप से पूछें और प्रार्थना करें।

Anand Vishwas
Anand Vishwas
आशा है कि यहां पर उपलब्ध संसाधन आपकी आत्मिक उन्नति के लिए सहायक उपकरण सिद्ध होंगे। आइए साथ में उस दौड़ को पूरा करें, जिसके लिए प्रभु ने हम सबको बुलाया है। प्रभु का आनंद हमारी ताकत है।

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