You Are Called To Finish Well | आपको अच्छी समाप्ति के लिए बुलाया गया है। | Are You Finishing Well?

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You Are Called To Finish Well. आपको अच्छी समाप्ति के लिए बुलाया गया है। आपको अपने जीवन का अच्छे से अन्त करने के लिए बुलाया गया है। तीमुथियुस को पत्र लिखते हुए पौलुस कहता है कि मैंने अच्छी कुश्ती लड़ी है, विश्वास की रखवाली की है और अपनी दौड़ पूरी की है। इससे हम पौलुस के जीवन में एक उद्देश्य पूर्ति की प्रेरणा पाते हैं। क्या आप भी अपने जीवन के अंत में इस प्रकार कह सकते हैं कि मुझे जो जिम्मेदारी दी गई थी उसे मैंने विश्वासयोग्यता से पूरा किया है? क्या अपने कभी इस विषय के बारे में गंभीरता से सोचा है?

आपने अपनी जीवन यात्रा चाहे कैसे भी शुरू की हो लेकिन आपको इसका अंत अच्छे से करना है।

आपका जीवन अनमोल है। इसे लापरवाही से जीने के लिए नहीं दिया गया है। इस जीवन में हर एक व्यक्ति के पास परमेश्वर ने कुछ न कुछ जिम्मेदारी सौंपी है जिसे उसे जीवनपर्यन्त पूरा करना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम इस वक्त सिद्ध हो गए हैं पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिए दौड़ते जाना है जिसके लिए उसने हमें पकड़ा है। (फिलिप्पियों 3:12-21) याद रखें कि हमारे पास एक निशाना है, मसीही लोग बिना लक्ष्य के नहीं हैं, उनको परमेश्वर ने एक विशेष कार्यभार सौंपा है। इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि बाकि लोगों का कोई उद्देश्य ही नहीं है। परमेश्वर ने तो सभी को अपने लिए बनाया है। मेरे कहने का तात्पर्य यही है कि मसीही लोग भी अपने जीवन के उद्देश्य को तभी जान पाए हैं, जब उन्होंने परमेश्वर के जीवित वचन को पढ़ा है।


एक बार की बात है किसी जगह समुद्र के बीच एक ऐसी जगह थी जहां पर समुद्री जहाजों की दुर्घटना हुआ करती थी। वहां पास में एक टापू भी था। एक बार एक बचाव दल (Rescue Team) ने निर्णय लिया कि हम वहां नजदीक में जो टापू है वहां पर अपने लिए एक घर बनाएंगे और जब नजदीक में कोई दुर्घटना हो तो हम जल्दी से पहुंच कर उनको बचा सकते हैं। उन्होंने वैसा ही किया भी।

You Are Called to Finish Well
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समय बीतने पर जब भी उस जगह में समुद्री जहाज़ों की दुर्घटनाएं हुआ करती थी तो समय पर पहुंच कर बचाब दल उन लोगों को बचा कर अपने पास उनको रुकवाते थे। उनका प्राथमिक इलाज करके उन्हें सुरक्षित उन्हें घर भेज देते थे। 

समय बीतने पर उन्होंने सोचा कि हमें यहां पर अस्पताल खोलना चाहिए ताकि जो लोग चोटिल होते हैं, उनका इलाज भी कर सकें। ऐसे ही वे वहां पर लोगों की सेवा करते और उनको सुरक्षित घर तक पहुंचने में मदद भी करते थे। 

समय बीतने पर और ज्यादा दुर्घटनाएं होने पर उन्होंने सोचा कि यहां पर एक होटल भी होना चाहिए ताकि जो कोई भी यहां पर आता है उनको कुछ सुविधा भी मिल सके… और हमारी कुछ कमाई भी हो सके।

एक बार उस जगह एक बहुत बड़ी दुर्घटना हो गई। उसमें इतने सारे लोग प्रभावित हुए कि उनका हॉस्पिटल भर गया, उसके बाद उनको लोगों को अपने होटल में भी रखना पड़ा। पर उस घटना के बाद जब उन्होंने देखा कि हमारा तो होटल भी काफी गंदा हो गया है। तब उन्होंने निर्णय लिया कि अगली बार से हम लोगों को रेस्क्यू नहीं करेंगे।…


ठीक ऐसी ही स्थिति आज कुछ मसीहियों की हो गई है, उन्हें परमेश्वर ने लोगों को सुसमाचार प्रचार करने की जिम्मेदारी दी है, वे जीवते परमेश्वर के गवाह हैं, वे मसीह के राजदूत हैं पर लोगों ने सोचा इसके साथ कुछ और भी काम शुरू किया जाए ताकि व्यवसाय भी होता रहे। इस प्रकार वो अब अपने व्यवसाय में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अब उनके पास परमेश्वर के सौंपे हुए काम के लिए समय ही नहीं है।

हर एक मसीही के लिए परमेश्वर ने बुलाहट रखी है, जिसे उन्हें अपने जीवन में पूरा करना है। हम सभी मसीहियों से ये आशा की जाती है कि हम परमेश्वर का काम अच्छे से पूरा करें जो हमें सौंपा गया है। हमें भूल नहीं जाना है क्योंकि परमेश्वर ने हमें चुना और नियुक्त किया है, बहुत सा फल लाने के लिए। 

मुझे लगता है कि कई लोग मसीही तो बन गए हैं पर उन्होंने कभी हिसाब लगाने के लिए समय निकाला ही नहीं। यीशु ने कहा था कि…

“तुम में से कौन है जो गढ़ बनाना चाहता हो, और पहले बैठकर खर्च न जोड़े कि पूरा करने की सामर्थ्य मेरे पास है कि नहीं? कहीं ऐसा न हो कि जब वह नींव डाल ले पर तैयार न कर सके, तो सब देखनेवाले यह कहकर उसे ठट्ठों में उड़ाने लगें, ‘यह मनुष्य बनाने तो लगा पर तैयार न कर सका?’ या कौन ऐसा राजा है जो दूसरे राजा से युद्ध करने जाता हो, और पहले बैठकर विचार न कर ले कि जो बीस हज़ार लेकर मुझ पर चढ़ा आता है, क्या मैं दस हज़ार लेकर उसका सामना कर सकता हूँ, या नहीं? नहीं तो उसके दूर रहते ही वह दूतों को भेजकर मिलाप करना चाहेगा। इसी रीति से तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, वह मेरा चेला नहीं हो सकता।” (लूका 14:28‭-‬33 HINOVBSI)

मसीही लोग ऐसे हैं जिन्हें भले कामों को करने के लिए सृजा गया है, जो उनके लिए पहले से तैयार किए गए हैं। (इफिसियों 2:10) वो जगत की ज्योति हैं, वो धरा के नमक हैं। इन भले कामों को देखने के द्वारा लोग परमेश्वर की बड़ाई भी करेंगे। (मती 5:13-16)

हम में से हर व्यक्ति को परमेश्वर ने एक विशेष उद्देश्य के साथ रचा है। इस दुनियां में रहते हुए हमें अपने रचयिता, पिता परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार जीना है और उन्हें पूरा करना है। हमारा उसकी इच्छाओं को जानकर उनको पूरा करना, परमेश्वर को प्रसन्नता प्रदान करता है। पर बहुत बार कई लोग जान नहीं पाते हैं कि उन्हें किस प्रकार परमेश्वर की इच्छाओं को जानना है और उनको पूरा करना है। आज हम इसी विषय में बात करेंगे। 

हमारे जीवन में सिर्फ यह जरूरी नहीं है कि हम परमेश्वर की इच्छाओं को अपने जीवन में जाने बल्कि यह जरूरी है कि हम उन इच्छाओं को अपने जीवन के द्वारा अच्छे से पूरा भी करें। तो फिर कैसे उस कार्यभार को ढूंढें जो परमेश्वर ने आपको दिया है?

अपने ईश्वरीय कार्य को ढूंढना। 

हम कैसे इस कार्य या जिम्मेदारी को ढूंढ सकते हैं जिसे करने के लिए परमेश्वर ने हमारा निर्माण किया है? मैं आपको कुछ सुझाव दे सकता हूं। आप इस समय अपनी नोटबुक में उन चीज़ों या कार्यों को लिखिए जिनसे आप प्यार करते हैं। उसके बाद उन चीज़ों या कार्यों को भी लिखें जिनसे आप नफरत करते हैं और अंत में आप उन चीज़ों या कार्यों को भी लिखें जो आपको प्रेरित करते हैं।

इस तरीके से भी आपके ईश्वरीय कार्य को खोजने का सुराग लग सकता है। तो फिर क्या करें? आइए सबसे पहले इन्हें लिखें। मेरा आपसे आग्रह है कि आप थोड़ा रुकें और प्रार्थनापूर्वक इन्हें लिखें।

  1. उन कार्यों या चीजों को लिखें जिन्हें आप सबसे ज्यादा करना पसंद करते हैं। थोड़ा समय बिताएं, ये इतना जल्दी से होने वाला काम भी नहीं है। 
  2. उन कार्यों या चीजों को लिखने में थोड़ा समय लगाएं जिनसे आप नफरत करते हैं।
  3. उन चीजों को या कार्यों को लिखिए जो आपको प्रेरित करती हैं।

दिए गए कार्यभार को समाप्त करना।

प्रभु यीशु ने भी एक उद्देश्यपूर्ण जीवन जीया। ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिस वक्त बार-बार यीशु ने कहा कि मुझे अपने भेजने वाले की इच्छा को पूरी करना है। एक बार जब हम देखते हैं कि सामरिया में उनके शिष्य जब भोजन लेकर लौटे थे और उस बीच में यीशु ने उस सामरी महिला को सच्चे परमेश्वर या मसीहा के बारे में बताया, उसके बाद शिष्यों से उनका कहना था कि मेरा भोजन यह है कि मैं अपने भेजने वाले की इच्छा पर चलूं और उसका काम पूरा करूं। (यूहन्ना 4:34) 

परन्तु मेरे पास जो गवाही है वह यूहन्ना की गवाही से बड़ी है; क्योंकि जो काम पिता ने मुझे पूरा करने को सौंपा है अर्थात् यही काम जो मैं करता हूँ, वे मेरे गवाह हैं कि पिता ने मुझे भेजा है। (यूहन्ना 5:36 HINOVBSI)

पौलुस अपने पास सौंपे गए कार्यभार को जानता था तभी वो कहता है कि, मैं अपने जीवन को अपने लिए कुछ भी नहीं मानता, मुझे तो केवल अपनी दौड़ पूरा करना है और उस कार्य को पूरा करना है जो प्रभु यीशु ने मुझे दिया है। (प्रेरित 20:24)

प्रेरित पौलुस कुरिंथियों की कलीसिया को लिखता है कि आप वो कार्य पूरा कर सकते हैं, आपके पास दी हुई पूंजी के द्वारा भी। (2 कुरिंथियोंं 8:11) इससे पहले प्रेरित पौलुस कहता है कि हमें न सिर्फ विश्वास में, वचन में, ज्ञान में, सब प्रकार के यत्न में, प्रेम में बढ़ते जाना है पर इसके साथ-साथ हमें परमेश्वर के राज्य के निर्माण में देने के द्वारा भी हमें उस कार्यभार या जिम्मेदारी को पूरा करना है जो हमें दिया गया है। (2 कुरिंथियोंं 8:7)

प्रेरित पौलुस भी एक ऐसा व्यक्ति था जो केंद्रित होकर अपने कार्य को करता था। उसे मालूम था कि उसका काम क्या है जो उसे अपने जीवन में पूरा करना है। प्रेरित पौलुस कहता है कि मैंने अच्छी कुश्ती लड़ी है, मैंने अपनी दौड़ को पूरा कर लिया है और मैंने अपने विश्वास की रखवाली की है। (2 तिमुथियुस 4:7)

कार्यभार अच्छी तरह से सम्पन्न करने के लिए बाधाएं।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने कितनी अच्छी शुरुआत की और हम कितनी अच्छी तरह आगे बढ़ रहे हैं। असली मुद्दा तो दौड़ को पूरा करने के लिए अच्छी तरह से फिनिश लाइन तक पहुंचना है। इब्रानियों का लेखक भी हमें कुछ संकेत देता है कि हम कैसे इन बाधाओं को जानकर इन्हें दूर कर सकते हैं। (पढ़ें इब्रानियों 12:1-2) मेरा सुझाव है कि आप इस वक्त थोड़ी देर के लिए रुकें और इस अभ्यास को करें।

  1. अब उन बातों को लिख लें जो आपको इस वक्त आगे बढ़ने से रोक रही हैं।
  2. उन पापों को भी लिखिए जो अभी आपको उलझा रहे हैं।

कुछ बाइबल के लोग जिन्होंने अच्छी तरह से समाप्त नहीं किया।

हमारे पास बाइबल में ऐसे कुछ उदाहरण भी हैं जिन्होंने अपने जीवन का अंत अच्छे से नहीं किया या हम यूँ भी सकते हैं कि जो कार्य उनको परमेश्वर ने दिया था उसको उन्होंने सम्पन्न नहीं किया। ऐसा नहीं है कि बाइबल में सिर्फ ये ही उदाहरण हैं जिन्होंने अपने जीवन में विश्वासयोग्यता नहीं दिखाई। यहाँ पर मेरा मकसद है कि हम उन गलतियों को न दोहराएँ जो उन्होंने की थी ताकि हम भी अपने जीवन में परमेश्वर द्वारा दिए गए कार्यभार को अच्छे से संपन्न कर सकें।

लूत – इसने अपने चाचा अब्राहम के साथ एक अच्छी शुरुआत की थी और काफी धनी भी हो गया था। लूत परमेश्वर को भी जानता था। क्या आपको मालूम है कि इसने क्या गलती की? ये धन के पीछे भागा, ये चमक-दमक के पीछे भागा और इसने सदोम के पाप को नजरंदाज किया। इसने अच्छी तराई को देखा और उसकी और आकर्षित हुआ। आपको मालूम ही है कि वहां के लोग कितने दुष्ट थे। इन बातों को जानने के बाद भी उसने उस जगह का चुनाव किया। (उत्पति 13:10-13) इसका क्या परिणाम हुआ? उसे वहां से भागना पड़ा, उसने अपनी पत्नी को खोया और अंत में अपनी बेटियों के बच्चों का पिता बना। (उत्पति 19:30-38)

रूबेन – यह याकूब की पहली संतान थी। इसने क्या गलत किया? इसने अपने पिता की उपपत्नी अर्थात अपनी छोटी मां के साथ व्यभिचार किया। (उत्पति 35:22) इसका क्या परिणाम हुआ? इसने अपने पहिलौठे (पहली संतान) होने के हक को गंवा दिया। (1 इतिहास 5:1)

इस्राइली – ये लोग परमेश्वर की बड़ी सामर्थ से मिस्र की गुलामी से छुड़ाए हुए लोग थे। इन्होंने परमेश्वर के किए हुए कई आश्चर्यों को अपनी आंखों से देखा था। इन्होंने क्या गलत किया? प्रतिज्ञा के देश की यात्रा में सदैव परमेश्वर और मूसा के विरुद्ध कुड़कुड़ाते रहे। विश्वास नहीं किया कि यहोवा परमेश्वर ने उन्हें प्रतिज्ञा की भूमि दी है। (व्यवस्थाविवरण 1:26-40) इसका क्या नतीजा निकला? आपको मालूम ही होगा कि मिस्र की गुलामी से निकलने के बाद यहोशू और कालेब के अलावा इनमें से कोई भी उस प्रतिज्ञा की गई भूमि में प्रवेश नहीं कर पाया। (व्यवस्थाविवरण  1:35-40)

कोरह – ये एक काफी प्रभावशाली अगुवा था। इसने क्या गलत किया? इसने मूसा और हारुन के प्रति विद्रोह किया। (गिनती 16:1-3) इसका क्या परिणाम हुआ? अपने परिवार समेत नाश किया गया। (गिनती 16:31-33)

आकान – ये भी एक इस्राइली जाति का अगुवा था। इसने क्या गलती की? इसने उस आज्ञा का पालन नहीं किया जो परमेश्वर ने यहोशू के द्वारा दी थी कि यरीहो की लूट में से कुछ भी न लेना। इसने कुछ छुपा लिया था। (यहोशू 7:1, 20-21) इसका क्या नतीजा निकला? अपने परिवार के द्वारा पत्थरवाह किया गया। (यहोशू 7:24-26)

याजक एली – ये इस्राएलियों का एक याजक था जिसने उनकी लगभग 40 सालों तक अगुवाई की। इसने क्या गलत किया? इसने परमेश्वर से ज्यादा अपने पुत्रों का आदर किया। (1 शमूएल 27-29) इसका क्या नतीजा हुआ? इसने अपने दोनों पुत्रों को खोया और खुद भी कुर्सी से गिर गया और उसकी गर्दन टूट गई और उसकी मृत्यु हो गई। (1 शमूएल 4:12-22) 

राजा शाऊल – ये इस्राएलियों का पहला राजा था। इसने क्या गलत किया? एक अवसर पर जब शमूएल ने देरी की, उसने खुद ही याजक का काम किया जिसे राजा को करने की अनुमति नहीं थी। दूसरी बार अमेलिकियों को पूरी तरह से नष्ट न करके परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया। (1 शमूएल 13:5-14, अध्याय 15) इसका क्या परिणाम हुआ? परमेश्वर ने उससे राज्य छीन कर दाऊद को दे दिया और अंत में युद्ध के मैदान में आत्महत्या कर दी। (1 शमूएल 15:23, 1 शमूएल 31:4:6) 

राजा सुलैमान – राजा सुलैमान इस्राएल का तीसरा राजा था। जो कि बहुत धनवान और दुनियां में सबसे बुद्धिमान व्यक्ति था। इसने परमेश्वर के लिए मंदिर का निर्माण करवाया। इसने क्या गलत किया? इसने बहुत सी अन्यजतियों में से विवाह किए, इसकी इन पत्नियों और उपपत्नियों ने इसके हृदय को सच्चे परमेश्वर से भटका दिया। (1 राजा 11:1-8) इसका क्या परिणाम हुआ? उसने परमेश्वर यहोवा के साथ-साथ अपनी पत्नियों के झूठे ईश्वरों का भी सम्मान किया। जिस कारण उसके बाद उसका राज्य दो भागों में बंट गया। (1 राजा 11:9-13)

राजा हिजकिय्याह – इसने शुरुआत में अपने जीवन में वही किया जो परमेश्वर को प्रसन्न करता था। यहूदा में उसके जैसा राजा ना पहले हुआ न बाद में। उसने मूर्तियों को नष्ट किया, उसने सुरंगे खुदवाईं और अपने राज्य में पानी का प्रबंधन किया। उसने अपनी बीमारी से चंगाई प्राप्त की और 15 वर्ष अधिक जीवन व्यतीत कर पाया। उसने क्या गलत किया? उसने अपने वैभव और खजाने को दूसरे राज्य के लोगों को दिखाया। (2 राजा 20:12, 13) इसका क्या नतीजा निकला? इसके परिणामस्वरूप उसके घराने के लोग और राष्ट्र के लोग दासता में चले गए। (2 राजा 20:12-20) 

रानी वशती– ये राजा क्षयर्स की रानी थी जो कि 127 प्रांतों पर राज्य करता था जिसमें हिंदोस्तान भी था। इसने क्या गलती की? राजा की आज्ञा का पालन नहीं किया जो कि उसका पति भी था। (एस्तेर 1:10-12) इसका क्या परिणाम हुआ? अपने पटरानी होने का पद को खो दिया। (एस्तेर 1:13-20)

यीशु के कई शिष्य – यीशु के कई शिष्यों ने भी अपने जीवन का अच्छे से अंत नहीं किया। ये यीशु के साथ चले थे, इन्होंने यीशु को छुआ था, उसे देखा था और उसकी शिक्षाओं को भी सुना था। (यूहन्ना 6:60-66) इसका क्या परिणाम हुआ? इसके परिणाम स्वरूप उन्होंने प्रभु यीशु को छोड़ दिया जो कि जीवन की रोटी था अर्थात हमारी प्रतिदिन की जरूरत। 

यहूदा इस्करियोती – जो कि प्रभु यीशु के बारह शिष्यों में से एक था और खजांची भी था। इसने प्रभु यीशु के साथ साढ़े तीन साल व्यतीत किए थे। इससे क्या गलती हुई? यह धन का लोभी था। (लूका 22:1-6) इसका क्या परिणाम हुआ? उसने अपना जीवन समाप्त कर दिया। (मती 27:1-10)

ये हमने कुछ ऐसे उदाहरण देखे जिनसे हमें सीखने की आवश्यकता है ताकि हम भी अपने जीवन का अच्छे से अंत कर सकें। मुझे लगता है कि आप समझ रहे होंगे कि ये कितना गंभीर मसला है। आइए अब कुछ ऐसे उदाहरणों को भी देखें जिनसे हमें प्रेरणा मिलती है कि हम भी अपने जीवन का अंत अच्छे से कर सकते हैं। अर्थात उस दौड़ को पूरा कर सकें जिसके लिए प्रभु ने हमें बुलाया है।

बाइबल के कुछ लोग जिन्होंने अच्छी तरह से समाप्त किया। 

परमेश्वर का धन्यवाद हो कि उन विश्वासयोग्य लोगों के लिए जिनको हम पवित्रशास्त्र में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए पाते हैं। यहाँ नीचे कुछ उदाहरण आपके सामने पेश कर रहा हूँ, पर इसका मतलब ये नहीं है कि बाइबल में सिर्फ ये ही विश्वासयोग्य लोग हैं जिनसे हम सीख सकते हैं कि इन्होंने परमेश्वर द्वारा सौंपा गया कार्यभार को सम्पन्न किया। यहाँ हम सभी के बारे में तो बात नहीं करेंगे, पर कुछ लोगों के बारे में ही बात करेंगे। वो इसलिए क्योंकि इनकी सूचि काफी लम्बी है। मेरा सुझाव है कि आप इस बारे में अपनी समझ का विस्तार करने के लिए इब्रानियों का 11 अध्याय पूरा पढ़ें।

अब्राहम – अब्राहम ने जीवित परमेश्वर की पुकार का उत्तर दिया और अपने देश, अपने लोगों को छोड़ दिया और परमेश्वर यहोवा के पीछे चलता गया। इसका क्या परिणाम हुआ? इसका परिणाम ये हुआ कि अब्राहम अनेक राष्ट्रों के पिता बने। अब्राहम के द्वारा ही आज पूरा भूमंडल परमेश्वर की आशीष प्राप्त कर पाया है। (उत्पति 12:1-3)

राहाब – राहाब ने यहोशू के जासूसों को छिपाकर उनकी मदद की। (पढ़ें यहोशू अध्याय 2) इसका क्या परिणाम निकला? इसके परिणामस्वरुप उसे और उसके परिवार को बख्शा गया। (यहोशू 6:24, 25)

कालेब और यहोशूकालेब और यहोशू वादा की हुई भूमि देने के परमेश्वर के वादे में विश्वास करते थे। (गिनती 13:30) इसके फलस्वरूप मिस्र की गुलामी से बाहर आने वालों में से केवल वे दो ही प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश कर पाए। (व्यवस्थाविवरण 1:34-38) 

शिमशोन – अपनी असफलता के लिए पछताया और फिर से परमेश्वर पर भरोसा किया। (न्यायियों 16:28) जिसके फलस्वरूप शिमशोन ने अपनी मृत्यु के समय जीवित रहने की तुलना में अधिक पलिश्तियों को मार डाला। (न्यायियों 16:30)  

रुत – रुत ने इस्राएल के परमेश्वर को अपना परमेश्वर मान लिया था। जिसके परिणामस्वरुप वह यीशु की परदादी बनीं।

दाऊद – पवित्रशास्त्र बताता है कि दाऊद परमेश्वर के ह्रदय के जैसा एक व्यक्ति था। इसका परिणाम ये हुआ कि उसका सिंहासन सदा के लिए स्थापित हो गया।

एलिय्याह – एलिय्याह परमेश्वर का एक साहसी गवाह था जिसने सिहासी ताकतों को भी हिलाकर रख दिया। परिणामस्वरुप जीवित स्वर्ग तक ले जाया गया।

पतरस – पतरस ने यीशु का इंकार करने बाद सच्चा पश्चाताप किया। जिसके फलस्वरूप वह बहुत लोगों के बीच परमेश्वर का गवाह बना और अंत में मसीह के लिए शहीद हो गया। 

अन्य प्रेरित – उन्होंने विश्वासयोग्यता से साथ सुसमाचार का प्रचार किया और पूरी दुनियां में मसीह के गवाह बने और यीशु के लिए मरे। आज हमारे पास भी सुसमाचार पहुँच पाया है।

पौलुस – पौलुस ने मसीह को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार किया और उसका जीवन बदल गया। पौलुस विशेष रूप से अन्यजातियों के लिए एक महान प्रेरित बन गया। पौलुस ने अपना काम बखूबी पूरा किया। (2 तीमुथियुस 4:7)

ठीक इसी प्रकार हम सभी के पास एक ऐसा कार्य या जिम्मेदारी है जिसके लिए परमेश्वर ने हमें रचा है। अंत में मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि आप भी ईमानदारी से परमेश्वर द्वारा सौंपे गए कार्यभार को पूरी विश्वासयोग्यता के साथ संपन्न करने का प्रयास करें। हम ये परमेश्वर के अनुग्रह से कर सकते हैं। तभी तो पौलुस ये कह पाया कि मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली कर ली है। (2 तीमुथियुस 4:7)

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ये सभी लोग भी हमारे ही समान दुःख-सुख भोगी इन्सान थे, इनसे भी अपने जीवन में गंभीर गलतियाँ हुई थी पर इनमें एक बात सामान्य थी कि जो गलती इनसे हुई उसको उन्होंने दोहराया नहीं। बल्कि सच्चा पश्चाताप करके परमेश्वर के साथ विश्वासयोग्यता से चलने का निर्णय लिया और ये उसमें सफल भी हुए। यही काम हम भी कर सकते हैं।

वचन हमें उत्साहित करता है कि हमारा इनाम नाशवान नहीं हैं। याद रखें कि आपको अपनी दौड़ को संपन्न करने लिए बुलाया गया है। (You Are Called to Finish Well.)

शालोम

Anand Vishwas
Anand Vishwas
आशा है कि यहां पर उपलब्ध संसाधन आपकी आत्मिक उन्नति के लिए सहायक उपकरण सिद्ध होंगे। आइए साथ में उस दौड़ को पूरा करें, जिसके लिए प्रभु ने हम सबको बुलाया है। प्रभु का आनंद हमारी ताकत है।

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