“Lord Jesus Christ” | “प्रभु यीशु मसीह” इस शीर्षक का अर्थ क्या है? 

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“Lord Jesus Christ” | “प्रभु यीशु मसीह” इस शीर्षक का अर्थ क्या है? बहुत बार बिना शब्दों के अर्थ को जानकर उनका उच्चारण हमारे लिए बहुत आसान हो जाता है। वैसा ही कई बार, कई मसीहियों के लिए भी “प्रभु यीशु मसीह” (Lord Jesus Christ) एक ऐसा शीर्षक बन जाता है, जिसे वे बिना अर्थ जानकार बोलते रहते हैं। 

यही समस्या उस वक्त भी थी जब यीशु को सुनने के लिए, चंगा होने के लिए, उनकी गलतियों को ढूंढने भीड़ या शास्त्री उनके पीछे आया करते थे। वे भी यीशु को प्रभु तो बोलते रहते थे पर उसकी प्रभुता को स्वीकार नहीं करते थे। इस विषय के बारे में विस्तार से हम पहले ही देख चुके हैं कि मसीहियों के लिए आज्ञाकारिता वैकल्पिक नहीं है पर अनिवार्य है। (लूका 6:46-49)

तब यीशु ने उनसे कहा कि जो व्यक्ति मेरी बातें सुनकर मानता है वह उस बुद्धिमान व्यक्ति के समान है जिसने घर बनाते समय चट्टान पर नींव खोदकर घर का निर्माण किया। एक समय बाढ़ आने या जल की धारा लगने पर भी उस घर का कुछ बिगाड़ नहीं पाई, क्योंकि वह घर पक्का बना हुआ था। वो भी नींव खोदकर!

पर जो व्यक्ति यीशु की बातों को सुनकर उसकी नहीं मानता है, वह एक ऐसे व्यक्ति के समान है जिसने अपना घर बनाते समय पक्की नींव बनाने पर कोई ध्यान नहीं दिया और मिट्टी पर बिना नींव के ही घर बना दिया। एक समय उस पर भी धारा चली और वह घर सत्यानाश हो गया।

इस पूरे भाग में यीशु की प्रभुता को स्वीकार करने के फायदे भी बताए गए हैं और उसकी प्रभुता को अस्वीकार करने के नुकसान के बारे भी बताया गया है। मसीहियों के लिए यीशु की प्रभुता को स्वीकार करना उनकी आज्ञाकारिता में दिखाई देता है। अगर कोई भी व्यक्ति यीशु की प्रभुता को स्वीकारता है तो वह व्यक्ति एक आज्ञाकारी जीवन भी जीएगा। क्योंकि उसे मालूम है कि अनाज्ञाकारी जीवन जीना, आखिरकार सत्यानाश की ओर ले जाता है।

ये भाग हमें बताता है कि यदि हम हमारा आत्मिक जीवन मजबूत बनाना चाहते हैं तो यीशु की प्रभुता हमारे जीवन के हर भाग में हमारी आज्ञाकारिता के द्वारा दिखनी चाहिए। अन्यथा हमारा आत्मिक जीवन खतरे में है। प्रभु यीशु को प्रभु बोलना, वो भी बिना प्रभुता को स्वीकार किए और आज्ञाकारिता के बगैर, ऐसा जीवन समय आने पर सत्यानाश हो जाएगा।  

“प्रभु यीशु मसीह” (Lord Jesus Christ) इस शीर्षक का अर्थ समझने के लिए हमें इन शब्दों को अलग-अलग करके समझना होगा। इन शब्दों का बहुत ही महत्व है। “प्रभु यीशु मसीह” रोमियों 1:7 में दिए गए शीर्षक में हर शब्द का अर्थ है। प्रभु, मसीह की सार्वभौमिकता और परमेश्वरत्व के बारे में बताता है। प्रभु का अर्थ होता है, “स्वामी”, “मालिक”, “शासक”, “मुखिया” और “राजा” होता है। वह स्वर्ग और पृथ्वी का अधिकारी है। (मती 28:18) यीशु, इब्रानी शब्द है जिसका अर्थ है “बचाने वाला।” यीशु, मसीह की मानवता के बारे में बताता है। 

यह उस मनुष्य के जीवन और मौत और पुनरुत्थान के बारे है जो इतिहास में एक निश्चित समय पर धरती पर संपूर्ण मानवजाति को उनके पापों से बचाने को आया। “मसीह” का अर्थ है, “अभिषेक किया हुआ।” जिसे आमतौर पर मसीहा के नाम से सभी जानते हैं। यह मसीह के किए गए कार्य के बारे में बताता है। उसका अभिषेक और नियुक्ति एक निश्चित कार्य करने के लिए हुई थी। 

याद रखिए कि मसीही जीवन में हमारी यात्रा की शुरुआत यीशु की प्रभुता को स्वीकार करके शुरू हुई थी। (रोमियों 10:9) और एक समय आ रहा है जिन्होंने उसकी प्रभुता को स्वीकार नहीं किया है वे भी उसकी प्रभुता को स्वीकार करेंगे। (फिलिप्पियों 2:5-11) पर मसीहियों को उस वक्त का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनके पास ये सौभाग्य आज भी उपलब्ध है। वे उसकी प्रभुता को स्वीकार करके उसकी आज्ञाकारिता में जीवन जी सकते हैं और अपने आत्मिक जीवन को मजबूत और स्थिर कर सकते हैं।

  • क्या आप शीर्षक “प्रभु यीशु मसीह” (Lord Jesus Christ) इसका अर्थ समझ पाए हैं?  
  • क्या आप भी बिना अर्थ को जानकर यीशु को प्रभु बोलते रहते हैं?
  • क्या जीवन की किसी विशेष परिस्थिति में यीशु की प्रभुता के सामने समर्पण करने में आपको कोई कठिनाई हुई है?
  • क्या उसकी प्रभुता को स्वीकार करना, आपकी आज्ञाकारिता के द्वारा आपके जीवन से प्रदर्शित होता है?

शालोम

Anand Vishwas
Anand Vishwas
आशा है कि यहां पर उपलब्ध संसाधन आपकी आत्मिक उन्नति के लिए सहायक उपकरण सिद्ध होंगे। आइए साथ में उस दौड़ को पूरा करें, जिसके लिए प्रभु ने हम सबको बुलाया है। प्रभु का आनंद हमारी ताकत है।

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